जुए में राजपाट और सुख सब कुछ हार जाने के बाद महाराज युधिष्ठिर पाचों भाई और पत्नी पांचाली के साथ वन में भटकते फिरते हैं। ऐसे समय में पवन से उत्पन्न महाबली भीम और हवन अग्नि से उत्पन्न पांचाली युधिष्ठिर का विरोध करती है।
दोनों चाहते हैं कि युधिष्ठिर कौरवों के प्रति युद्घ की घोषणा करें लेकिन युधिष्ठिर शांति की वकालत करते हैं। द्रौपदी कहती है कौरवों के प्रति क्षमा धारण करने का कोई काल अब नहीं रह गया। और तेज प्रकट करने का काल आने पर आपके लिए उचित है कि आप तेज ही प्रकट करें।
धर्मराज युधिष्ठिर शांतिपूर्वक द्रौपदी की भर्त्सना तथा उसका परामर्श सुन लेते हैं। तब वे द्रौपदी के उद्बोधन के लिए तेज और क्रोध के बीच भेद बतलाते हैं। वे कहते हैं पण्डितगण जिस मनुष्य को तेजस्वी कहते हैं उसके अंतर में क्रोध का आविर्भाव नहीं होता। यह बात तो सुनिश्चित है।
अन्तर में आविर्भूत क्रोध को जो मनुष्य विवेक द्वारा रूद्घ कर देते हैं, उसी मनुष्य को तत्वदर्शी विद्वान लोग तेजस्वी मानते हैं। क्रोध के आविष्ट में मनुष्य भली-भांति यह नहीं समझ पाता कि कौन सा काम करने योग्य है। और क्रुद्घ मनुष्य न करने योग्य काम को भी नहीं देख पाता।
क्रोध के आविष्ट मनुष्य जिन लोगों पर क्रोध करता है वे सब उसी के समान प्रतिक्रुद्घ हो उठते हैं। मार खाने वाला मनुष्य प्रत्युत्तर में मारने लगता है। और जिस मनुष्य के प्रति हिंसा होती है, वह भी प्रत्युत्तर में हिंसारत हो जाता है।
"तब पिता अपने पुत्रों को मारने लग जाते हैं, और पुत्र अपने पिताओं को; पति अपनी पत्नियों को मारने लग जाते हैं, और पत्नियां अपने पतियों को; " कृष्णे! इस प्रकार समस्त संसार के कुपित हो उठने पर कहीं भी शांति नहीं रह जाती।
भारत भारती प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक नल-दमयन्ती पुस्तक में इस प्रसंग का उल्लेख किया गया है। पुस्तक के लेखक सीताराम गोयल ने इस प्रसंग को महाभारत के तृतीय पर्व, वनपर्व से लिया है। वहां इस कथा का नाम "नलोपाख्यान" है। इस प्रसंग को धार्मिकम और कलिनाशनम भी कहा गया है। यानी इस प्रसंग को अपने व्यक्तित्व में शामिलकर लिया जाए तो कलियुग के प्रभाव से बचा जा सकता है।