बुद्ध उस समय श्रावस्ती में थे। कौशल नरेश प्रसेनजित का यज्ञ प्रारंभ हुआ, उसमें सैकड़ों पशुओं को बलि देने के लिए तैयार किया जा रहा था। भिक्षुओं ने भगवान बुद्ध को इस यज्ञ के बारे में बताया। बुद्ध ने कहा कि जिस यज्ञ में निरीह प्राणी मारे जाते हैं, उसमें सदाचारी महर्षि नहीं जाते। जहां प्राणियों की हिंसा नहीं होती और जो लोगों को प्रिय लगते हैं, उनमें महर्षिगण उपस्थित रहते हैं। विद्वानों को चाहिए कि वे ऐसा यज्ञ करें, जिसमें हिंसा न हो। दीर्घ निकाय के कूटदत्त सुत्त में बताया गया है कि राजाओं और धनी ब्राह्मणों को यज्ञ कैसे करना चाहिए।