सभी बारह ज्योतिर्लिंग में से श्रीमहाकाल ही दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजते हैं इसलिए यहां तांत्रिक जगत के साधकों का भी जमावड़ा रहता है। इनके दर्शनमात्र से प्राणी यमदण्ड के भय से तो मुक्त होता ही है बल्कि उसे नवग्रहों के दोष से भी छुटकारा मिल जाता है। जन्मकुंडली में चल रही शनि की शाढ़ेसाती, ढैया, मारकेश दशा, अशुभ गोचर-ग्रहों के दुष्प्रभाव से भी छुटकारा मिलता है। श्री महाशिवरात्रि के आरम्भ होने से पूर्व नौ दिन पहले से ही प्रतिदिन श्रीमहाकाल को दूल्हे की तरह सजाया जाता है जिसे शिवनवरात्रि महोत्सव का शुभारम्भ कहा जाता है । ये महामहोत्सव देखने के लिए पूरे संसार से शिवभक्तों का जनसैलाब महाकाल की नगरी उज्जैन में एकत्रित होता है।
शिवनवरात्रि के नौ दिनों के श्रृंगार
फाल्गुन कृष्णपक्ष की पंचमी से शिवनवरात्रि महोत्सव के पावनपर्व का शुभारंभ होता है। इस दिन से महाशिवरात्रि तक महाकाल के अलग-अलग रूपों का श्रृंगार किया जाता है। महोत्सव के प्रथम दिन सबसे पहले कोटितीर्थ कुण्ड स्थित कोटेश्वर महादेव पर शिवपंचमी का पूजन-अभिषेक आदि किया जाता है। वर्षों से चली आ रही यहां की परम्परा के अनुसार वैदिक ब्राम्ह्णों-पुजारियों को एक-एक सोला तथा वरूणी उपहार स्वरूप प्रदान किया जाता है। श्रीकोटेश्वर महादेव के पूजन आरती के पश्चात श्रीमहाकालेश्वर जी का पूजन-अभिषेक तथा वैदिक विद्वानों द्वारा नमक-चमक द्वारा रूद्राभिषेक किया जाता है, तदोपरान्त भोग आरती आदि कार्य सम्पन्न किये जाते हैं।
पंचमी तिथि को 'श्रीमहाकाल' का चन्दन का श्रृंगार, कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्ड माल, छत्र आदि से किया जाता है। षष्टी को श्रीमहाकाल का 'शेषनाग' श्रृंगार, कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्डमाल, छत्र आदि से किया जाता है जबकि सप्तमी तिथि को 'घटाटोप' श्रृंगार, कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्डमाल, छत्र आदि से अद्भुत श्रृंगार किया जाता है। अष्टमी तिथि को 'छबीना' रूप का श्रृंगार, कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्डमाल, छत्र आदि से और नवमी तिथि को 'श्रीहोल्कर' श्रृंगार, कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्डमाल, छत्र आदि से होता है।
दशमी तिथि को श्री 'मनमहेश' श्रृंगार, कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्डमाल, छत्र आदि से किया जाता है। एकादशी को श्री 'उमामहेश' श्रृंगार, कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्डमाल, छत्र आदि से और द्वादशी तिथि को'शिवतांडव' श्रृंगार, कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्डमाल, छत्र से श्री महाकाल का श्रृंगार किया जायेगा। महाशिवरात्रि पर पूजन आदि और निरंतर जलधारा प्रवाहित होगी। चतुर्दशी तिथि को'सप्तमधान' श्रृंगार (सेहरा दर्शन), कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्डमाल, छत्र आदि से श्रृंगार करके श्री परब्रह्म परमेश्वर महाकाल का स्तवन किया जाएगा। भक्तगण जय महाकाल, जय महाकाल का उद्घोष करते हुए इनके दर्शन का पूर्ण लाभ उठाकर अपने जीवन को धन्य करते हैं।
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