Mahashivratri 2023: महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा-आराधना करने पर शिव भक्तों की सभी तरह की मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
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Mahashivratri 2023: देवों के देव महादेव की आराधना का पर्व महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी युक्त चतुर्दशी तिथि में शनिवार को कई योग संयोगों के बीच मनाया जाएगा। इस दिन सर्वार्थसिद्धि, व्यातिपात और वरियान योग बन रहा है। करीब 24 साल बाद शनि प्रदोष व्रत का भी संयोग बनेगा। ज्योतिष मान्यता के अनुसार इस संयोग में पूजा-अर्चना बहुत अधिक शुभ रहने वाली है। शिवलिंग को भगवान शंकर का ही रूप माना जाता है,लेकिन ग्रंथों में इनकी पूजा और परिक्रमा के कुछ नियम बताए गए हैं, जिससे ये जल्दी ही प्रसन्न होते हैं। यदि नियमों का उल्लंघन किया जाए तो शिव पूजा के फल नहीं मिलते और भोलेनाथ रुष्ट होते हैं। सामान्य रूप से सभी देवी और देवताओं की प्रतिमा की परिक्रमा पूरी की जाती है, लेकिन शिवलिंग की परिक्रमा कभी पूरी नहीं करनी चाहिए। शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा आधी करनी चाहिए। हालांकि, शिव प्रतिमा की परिक्रमा पूरी की जा सकती है। शिवलिंग की परिक्रमा आधा कर वापस हो लेना चाहिए। आइए जानते हैं क्यों नहीं की जाती शिवलिंग की पूरी परिक्रमा।
शिवलिंग की आधी परिक्रमा क्यों?
सनातन धर्म के अनुसार जल को देवता माना गया है और पानी के पात्र को कभी भी पैर नहीं लगाया जाता। ठोकर लगा पानी न तो पिया जाता है न ही पिलाया जाता है,यह पाप तुल्य माना जाता है। ऐसे ही जो जल देव प्रतिमा पर चढ़ाया गया हो,उसे लांघा नहीं जाता। शिवलिंग पर नित्य अभिषेक होता है। जिस जल से देवता का अभिषेक हुआ है उसे पाँव नहीं लगे इसलिए प्रणाल के बाद भी चण्डमुख की व्यवस्था मंदिरों में की जाती है। इसलिए भगवान शिव की पूजा के बाद शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बायीं ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौट दूसरे सिरे तक आकर पूरी करनी चाहिए। इसे शिवलिंग की आधी परिक्रमा कहा जाता है।
जलहरी को न लांघें
शिवलिंग की जलहरी को भूल कर नहीं लांघना चाहिए। मान्यता के अनुसार ऐसा करना अशुभ माना जाता है। शिवलिंग की जलहरी को ऊर्जा और शक्ति का भंडार माना गया है। यदि परिक्रमा करते हुए इसे लांघा जाए तो मनुष्य को शारीरिक परेशानियों के साथ ही शारीरिक ऊर्जा की हानि का भी सामना करना पड़ता है। शिवलिंग की पूर्ण परिक्रमा से शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। इसी वजह से शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरह का कष्ट उत्पन्न होता है। शिवलिंग की अर्ध चंद्राकार प्रदक्षिणा ही करनी चाहिए।शास्त्रों के अनुसार कई स्थितियों में जलहरी को लांघने का दोष नहीं माना गया है। जैसे तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढंके हुए जलहरी को लांघने से दोष नहीं लगता है।
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