बाबा विश्वनाथ मंदिर
जहां अपने गणों समेत विराजमान हैं शिव
पांच कोस (पंचक्रोशी) के क्षेत्रफल वाले काशी क्षेत्र को शिव और पार्वती ने प्रलयकाल में भी कभी त्याग नहीं किया। यही वजह है कि यह क्षेत्र 'अविमुक्त' क्षेत्र कहा गया है। स्कन्द (कार्तिकेय) ने अगस्त्य जी को बताया कि यह काशी क्षेत्र भगवान् शिव के आनंद के कारण है, इसलिए इसे आनंदवन भी कहा जाता है। शिवपुराण की अन्य कथा के अनुसार माना यह भी जाता है कि काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग किसी मनुष्य की पूजा, तपस्या से प्रकट नहीं हुआ बल्कि यहां निराकार परमेश्वर ही शिव बनकर विश्वनाथ के रूप में साक्षात प्रकट हुए। शिव ने अपने वामांग से सतोगुण विष्णु को उत्पन्न किया और उनकी तपस्या के लिए मुक्तिदायिनी पंचक्रोशी को इस जगत में छोड़ दिया।
तपस्या से प्रसन्न होकर शिव-पार्वती ने विष्णु से वर मांगने को कहा। जगत कल्याण की कामना हेतु विष्णु ने भगवान् शिव से कहा- कि ब्रह्माण्ड के भीतर कर्मपाश से बंधे हुए प्राणी मोक्ष कैसे प्राप्त कर सकेंगे। विष्णु के आग्रह करने पर कैलाशपति, जो भीतर से सत्वगुणी और बाहर से तमोगुणी कहे गए है, शिव ने सद्गुण रूप में प्रकट होकर निर्गुण शिव से प्रार्थना करते हुए कहा - ''महेश्वर! मैं आपका ही हूं महादेव! मुझ पर कृपा कीजिए जगत्पते! लोकहित की कामना से आप सदा के लिए यहीं पर विराजमान हो जाइए, काशीपुरी को अपनी नगरी स्वीकार करें, आप उमा सहित सदा यहाँ विराजमान रहें'' और इस तरह भगवान् शंकर वहां अपने गणों सहित सदैव के लिए विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में काशी में विराजमान हो गए।
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