विवाह के बाद स्त्री पुरूष पति-पत्नी और जीवनसाथी कहलाने लगते हैं। जीवनसाथी होने का मतलब होता है जीवन में आने वाले हर सुख-दुःख और चीजों आपस में बांटना।
यही कारण है कि विवाह के बाद पति-पत्नी अपना बिस्तर भी आपस में बांटते हैं। माना जाता है कि इससे पति-पत्नी का आपसी प्यार बढ़ता है।
तो यौन संबंध से बचकर रहें
पति-पत्नी के प्यार से संतान की उत्पत्ति होती और संसार चक्र चलता रहता है। लेकिन हर पति-पत्नी को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हर महीने छह दिन ऐसे हैं जब दोनों को एक साथ एक बिस्तर पर नहीं सोना चाहिए।
अगर साथ सोते भी हैं तो यौन संबंध से बचकर रहें।
वह रातें जब साथ नहीं सोएं पति-पत्नी
मनु महाराज ने मनुस्मृति में लिखा है कि स्त्रियों के रजोदर्शन से सोलह रात्रियों तक को ऋतुकाल का ही समय मानना चाहिए।
इनमें रक्तस्राव तक की पहली चार रात्रियां ऐसी हैं जिनमें पति-पत्नी को साथ शयन करने से बचना चाहिए। क्योंकि इस अवधि में स्त्री अपवित्र रहती है। इन चार रात्रियों के अलावा दो और रातें हैं।
यह दो रातें भी साथ सोने के लिए ठीक नहीं
मनुस्मृति के अनुसार रजोदर्शन से ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रि भी पति-पत्नी को साथ सोने के लिए अनुकूल नहीं है। इस प्रकार यह कुछ छह रात्रियां ऐसी हैं जब स्त्री पुरूष को समागम से दूर रहना चाहिए। इन दिनों समागम करने से योग्य संतान की प्राप्ति नहीं होती है।
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