Hanuman Chalisa Ki Chaupai: हिंदू धर्म में मान्यता है कि भगवान हनुमान कलयुग में भी भक्तों की रक्षा के लिए सशरीर इस धरती पर मौजूद हैं और भ्रमण करते रहते हैं। भगवान हनुमान प्रभु राम के सबसे बड़े भक्त और सेवक माने गए हैं। ये भगवान शिव के रुद्रावतार हैं। रामायण के मुताबिक लंका विजय के बाद अयोध्या वापस आने पर अपने प्रिय भाई भरत को समस्त राजपाठ सौंपकर जब स्वयं परमधाम जा रहे थे तब उन्होंने अपने सबसे प्रिय भक्त हनुमानजी को कलयुग में धर्म की रक्षा करने और अपने भक्तों के समस्त कष्टो को दूर करने के लिए पृथ्वी पर ही रहने का आदेश दिया था। तभी से ऐसी मान्यता चली आ रही है कि भगवान हनुमान आज भी इस धरती पर मौजूद हैं। भगवान हनुमान को प्रसन्न करने के लिए गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित हनुमान चालीसा का पाठ करना बहुत ही शुभ और फलदाई माना गया है। हनुमान चालीसा की हर एक चौपाई में मनोरथ सिद्ध करने की ताकत है। आइए जानते हैं ऐसी ही कुछ चौपाईयों के बारे में...
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥ बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार।।
इस दोहे के पाठ से स्मरण शक्ति और बौद्धिक क्षमता बढ़ती है। स्वास्थ्य के मामले में भी यह चौपाई लाभप्रद रहती है।
नासै रोग हरे सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५॥
इस चौपाई के पाठ से रोग दोष का नाश होता है। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी में इन चौपाई का जप लाभप्रद माना गया है।
संकट तै हनुमान छुडावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥२६॥
हनुमान चालीसा की चौपाई पाठ से संकट और परेशानियों से मुक्ति मिलती है। ग्रह दोष या किसी अन्य कारणों से जीवन में कठिन समय चल रहा हो तब इसक पाठ लाभप्रद रहता है।
अंतकाल रघुवरपुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥३४॥
जो व्यक्ति मुक्ति की कामना करते हैं और मृत्यु के बाद नर्क की यातना से बचना चाहते हैं उन्हें इस चौपाई का पाठ करना चाहिए।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥
पद प्रतिष्ठा की इच्छा रखने वालों को हनुमान चालीसा की इस चौपाई का पाठ करना चाहिए।
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥३१॥
धन्य-धान्य और सिद्धियां हासिल करने के लिए हनुमान चालीसा की इस चौपाई का पाठ करें।
भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज संवारे॥१०॥
शत्रु और विरोधी आपको परेशान कर रहे हैं तो हनुमान चालीसा की दसवीं चौपाई का पाठ नियमित करें।