भगवान विष्णु एक निवास स्थान पृथ्वी पर है जिसे धरती का बैकुंठ कहते हैं। यह स्थान उत्तराखंड में नर और नारायण पर्वत के बीच में बसा है। माना जाता है कि त्रेतायुग तक इस स्थान पर भगवान विष्णु के साक्षात दर्शन प्राप्त होते थे।
द्वापर में जब भगवान विष्णु का कृष्ण रूप में अवतार हुआ तब इस स्थान पर नारायण का काले रंग का विग्रह प्रकट हुआ। वर्तमान समय में इसी विग्रह का दर्शन भक्तों को प्राप्त होता है। जिसे बद्रीनारायण के नाम से जाना जाता है।
बद्रीनारायण की यात्रा का आरंभ हर साल अक्षय तृतीया से होता है। इस वर्ष अक्षय तृतीया 13 मई को है। ब्रद्रीनाथ धाम की यात्रा के नियमानुसार सबसे पहले गंगोत्री की यात्रा करनी चाहिए। इसलिए अक्षय तृतीया के दिन गंगोत्री और यमनोत्री का कपट खुलता है। बद्रीनाथ सहित चार धाम की यात्रा करने वाले भक्त गंगोत्री पहुंचकर गंगा में स्नान करते हैं और केदरनाथ पर जल चढ़ाने के लिए जल भरते हैं।
गंगोत्री के बाद यात्रा का दूसरा चरण होता है यमनोत्री। माना जाता है कि केदारनाथ की यात्रा के बिना बद्रीनाथ के दर्शन का पूरा पुण्य नहीं मिलता है। इसलिए यात्रा के तीसरे चरण में केदारनाथ की यात्रा होती है। इनका कपाट बद्रीनाथ से पहले खुल जाता है। इस वर्ष 14 मई से केदानाथ का कपाट खुलेगा। गंगोत्री और यमनोत्री से केदरनाथ पहुंचने में एक दिन का समय लगता है।
बद्रीनाथ का कपाट 16 मई से खुलेगा। अक्षय तृतीया के दिन बद्रीनाथ अपने शीतकालीन निवास स्थान जोशी मठ से पालकी पर विरजमान होकर नर-नारायण पर्वत के बीच अलंकनंदा के तट पर बसे अपने धाम के लिए प्रस्थान करेंगे।
16 तारीख को ब्रद्रीनाथ के यहां पहुचने के साथ ही भक्तों के लिए इनका कपाट खुल जाएगा और इस दिन से शीत ऋतु के आगमन तक भक्त बद्रीनाथ के विग्रह का दर्शन कर पाएंगे। इस प्रकार चार धाम की यात्रा करने पर भगवान विष्णु के साक्षत् दर्शन का फल मिलता है।