शनिवार के दिन पीपल
वृक्ष की पूजा करते हुए बहुत से लोग मिल जाएंगे। पूर्णिमा और अमावस्या के दिन भी
पीपल के वृक्ष की पूजा करने वालों की कमी नहीं है। लोगों में ऐसा विश्वास है कि
पीपल के वृक्ष की पूजा करने से पितृगण प्रसन्न होते हैं और शनि दोष के कुप्रभाव से
मुक्ति मिलती है।
लोगों के इस विश्वास का कारण यह है कि शास्त्रों में इसे
देव वृक्ष कहा गया है। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने तो पीपल के वृक्ष को स्वयं
अपना ही स्वरूप बताया है। श्री कृष्ण ने कहा है 'अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणां' अर्थात्
समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूं। शास्त्रों में कहा गया है कि 'अश्वत्थ:
पूजितोयत्र पूजिता:सर्व देवता:।' अर्थात् पीपल की पूजा करने से एक साथ सभी देवताओं
की पूजा का फल प्राप्त हो जाता है।
स्कन्दपुराण में कहा गया है कि पीपल के
मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में श्रीहरि और फलों में
सभी देवताओं के साथ अच्युत भगवान निवास करते हैं। व्रतराज नामक ग्रंथ में बताया गया
है कि प्रतिदिन पीपल पर जल चढ़ाकर तीन बार परिक्रमा करने से आर्थिक समस्या एवं
भाग्य में आने वाली बाधा दूर हो जाती है।
नित पीपल की पूजा एवं दर्शन करने
से आयु और समृद्धि बढ़ती है। जो स्त्री नियमित पीपल की पूजा करती हैं उनका सौभाग्य
बढ़ता है। शनिवार के दिन अगर अमावस्या तिथि हो तब सरसो तेल का दीपक जलाकर काले तिल
से पीपल वृक्ष की पूजा करें और सात बार परिक्रमा करें तो शनि दोष के कारण प्राप्त
होने वाले कष्ट समाप्त हो जाते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी पीपल को पूजनीय
बनाता है क्योंकि यह एक ऐसा वृक्ष है जो गर्मी में शीतलता और सर्दी में उष्णता
प्रदान करता है। पीपल से हमेशा प्राण वायु यानी ऑक्सीजन का संचार होता है। आयुर्वेद
में बताया गया है कि पीपल का हर भाग जैसे तना, पत्ते, छाल और फल सभी चिकित्सा में
काम आते हैं। इनसे कई गंभीर रोगों का भी इलाज संभव है।