अधिक मास 18 सितंबर से प्रारंभ हो रहा है जो अगले महीने 16 अक्टूबर को समाप्त होगा। अधिक मास को मलमास के नाम से जाना जाता है। इस बार अधिक मास में ऐसा शुभ संयोग बन रहा है जो 160 साल पहले बना था। फिर 2039 में भी ऐसा संयोग बनेगा। दरअसल अंग्रेजी कैलेंडर में चार वर्ष में एकबार लीप ईयर आता है।
लीप ईयर में फरवरी का महीना 29 दिनों का होता है। जबकि हिन्दू कैलेंडर में लीप ईयर नहीं होता है, बल्कि इसमें अधिक मास होता है। इस साल संयोग ये है कि लीप ईयर और आश्विन अधिक मास दोनों एक साथ आएं हैं। ऐसा संयोग 160 साल पहले 1860 में बना था।
प्राचीन धर्मग्रंथों में पुरुषोत्तम मास में विष्णु स्वरुप शालिग्राम के साथ श्री महालक्ष्मी स्वरूपा श्री यंत्र का पूजन सयुंक्त रूप से करने का काफी महत्व बताया गया है। पुराणों में शालिग्राम को ब्रह्माण्डभूत श्री नारायण का प्रतीक माना जाता है।
पदम पुराण के अनुसार जो शालिग्राम का दर्शन करता है उसे मस्तक झुकाता, स्न्नान कराता और पूजन करता है वह कोटि यज्ञों के समान पुण्य तथा कोटि गोदानों का फल पाता है। इनके स्मरण, कीर्तन, ध्यान, पूजन और प्रणाम करने पर अनेक पाप दूर हो जाते हैं।
जिस स्थान पर शालिग्राम और तुलसी होते हैं। वहां भगवान श्री हरि विराजते हैं और वहीं सम्पूर्ण तीर्थों को साथ लेकर भगवती लक्ष्मी भी निवास करती हैं। पदमपुराण के अनुसार जहां शालिग्राम शिलारुपी भगवान केशव विराजमान हैं वहां सम्पूर्ण देवता, असुर, यक्ष तथा चौदह भुवन मौजूद हैं।
जो शालिग्राम शिला के जल से अपना अभिषेक करता है,उसे सम्पूर्ण तीर्थों में स्न्नान के बराबर और समस्त यज्ञों को करने के समान ही फल प्राप्त होता है। भगवान कार्तिकेय के पूछने पर भगवान शिव ने शालिग्राम की महिमा का गान करते हुए कहा है कि करोड़ों कमल पुष्पों से मेरी पूजा करने पर जो फल प्राप्त होता है वहीं शालिग्राम शिला के पूजन से कोटि गुना होकर मिलता है।
मेरे कोटि-कोटि लिंगों का दर्शन, पूजन और स्तवन करने से जो फल मिलता है वह एक ही शालिग्राम के पूजन से प्राप्त हो जाता है। जहां इनका पूजन होता है वहां पर किया हुआ दान, स्नान काशी से सौ गुना अधिक फल देने वाला माना गया है। शालिग्राम को अर्पित किया हुआ थोड़ा सा तुलसीपत्र, पुष्प, फल, जल, मूल और दूर्वादल भी मेरुपर्वत के समान महान फल देने वाला होता है।
पुरुषोत्तम मास के पहले दिन प्रातः काल नित्य नियम से निवृत हो श्वेत या पीले वस्त्र धारण कर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके किसी ताम्र पात्र में पुष्प बिछाकर शालिग्राम स्थापित करें। फिर शुद्धजल में गंगाजल मिलाकर,श्री विष्णुजी का ध्यान करते हुए स्न्नान कराएं।
इसके बाद शालिग्राम विग्रह पर चन्दन लगाकर तुलसी पत्र, सुगन्धित पुष्प,नैवेद्य, फल आदि अर्पित करें। यथा शक्ति 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करने के उपरान्त कपूर से आरती करें। अभिषेक के जल को स्वयं एवं परिवार के सदस्यों को ग्रहण कराएं।
इसी के साथ श्रीमदभागवत कथा, गीता का पाठ,श्री विष्णु सहस्त्र्नाम का पाठ पुरुषोत्तम मास में करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।