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यहां आकर देखिए आज भी श्री कृष्ण की मौजूदगी का एहसास करेंगे

Fri, 26 Aug 2016 08:54 AM IST
राकेश्ा झा / टीम डिजिट, अमर उजाला, दिल्ली।
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कृष्‍ण
भगवान श्री कृष्‍ण भले ही इस धरती पर लीला करके अपना लौक‌िक शरीर छोड़कर चले गए लेक‌िन अलौक‌िक रूप से आज भी इनकी मौजूद कण-कण में है लेक‌िन इसकी द‌िव्य अनुभूत‌ि आप असानी से इन 10 स्‍थानों पर कर सकते हैं।
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जन्‍मभूम‌ि
यह है भगवान श्री कृष्‍ण की जन्मस्‍थली। कहते हैं यहीं पर श्री कृष्‍ण का जन्म कंस के कारावास में हुआ था। यहां एक एक बड़ा सा चबूतरा बना हुआ है ज‌िसे श्री कृष्‍ण के जन्म का साक्षी माना जाता है। कमाल की बात तो यह है क‌ि यहां पर भगवान श्री कृष्‍ण की मूर्त‌ि नहीं है फ‌िर भी चबूतरे पर स‌िर ट‌िकाकर श्रद्धालुओं को श्री कृष्‍ण की मौजूदगी का अनुभव होता है।
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भंडीर वन
यह है भंडीर वन का वह स्‍थान जहां भगवान श्री कृष्‍ण का राधा के संग व‌िवाह हुआ माना जाता है। पूरी दुन‌िया में अकेला यहीं पर श्री कृष्‍ण राधा का व‌िग्रह है जहां श्री कृष्‍ण राधा की मांग में स‌िंदूर भरते द‌िखते हैं। गर्ग संह‌िता में राधा कृष्‍ण के व‌िवाह का ज‌िक्र क‌िया गया है ज‌िसमें ब्रह्मा जी को व‌िवाह करवाने वाला पुरोह‌ित बताया गया है। यहां एक कूप है ज‌िसे भंडीर कूप कहा जाता है ज‌िसके बारे में मान्यता है क‌ि हर सोमवती अमावस्या के द‌िन कूप से दूध की धारा न‌िकलती है।

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कृष्‍ण थाल
भगवान श्री कृष्‍ण की जन्मस्थली मथुरा से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कामां यानी काम्यवन यहां पर भगवान श्री कृष्ण ने व्योमासुर का वध किया था। व्योमासुर का वध करने के बाद श्री कृष्ण ने एक कुंड में स्नान किया जिसे क्षीर सागर और कृष्ण कुंड के नाम से जाना जाता है। स्नान के बाद श्री कृष्ण ने ग्वाल सखाओं के संग भोजन किया। यहां पहाड़ी पर भोजन के ल‌िए इस्तेमाल क‌िया गया थाल और कटोरी का चिन्ह मौजूद है।
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न‌िध‌िवन
वृंदावन का न‌िध‌िवन भी कृष्‍ण की मौजूदगी करवाते हैं। इस वन के वृक्षों की बनावट ऐसी है जैसे कोई नृत्य की मुद्रा में खड़ा हो। कहते हैं क‌ि इसी वन में श्री कृष्‍ण ने गोप‌ियों संग रास रचाया था। इस वन के वृक्ष रात के समय गोप‌ियां बन जाती हैं। श्री कृष्‍ण राधा के संग द‌िव्य रूप में प्रकट होकर यहां रात्र‌ि व‌िश्राम करते हैं। हर सुबह गीले दातून इस बात का संकेत देते हैं क‌ि श्री कृष्‍ण ने दंत धावन क‌िया है।
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काम्‍यवन
भगवान श्री कृष्‍ण गाय चराने के ल‌िए ग्वाल बाल के संग वृंदावन में दूर दूर तक चले जाते थे। गोचारण के समय श्री कृष्‍ण अपने सखाओं के संग पत्‍थरों से फ‌िसलने का खेल भी खेला करते थे। कलावता ग्राम के पास इन्द्रसेन पर्वत पर एक श‌िला है ज‌िसे फिसलनी शिला कहते हैं। माना जाता है क‌ि इस श‌िला पर भी श्री कृष्‍ण खेला करते थे। आज भी यहां आस-पास के बच्‍चे आपको खेलते हुए द‌िख जाएंगे जो एहसास द‌िलाते हैं क‌ि श्री कृष्‍ण अपने बाल सखाओं के संग खेल रहे हों।
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श्री कृष्‍ण चरण
काम्यवन में स्‍थ‌ित यह है चरण पहाड़ी मंद‌िर जहां मौजूद हैं भगवान श्री कृष्‍ण के चरण च‌िन्ह। कहते हैं एक बार श्री कृष्‍ण लुपा छ‌िपी का खेल खेलते हुए अदृश्य हो गए तो ग्वाल बाल दुखी होकर प्राण त्यागने का व‌िचार करने लगे। ऐसे समय में श्री कृष्‍ण एक बड़े से श‌िला पर प्रकट होकर बंशी बजाने लगे। उस समय श‌िला ने अपनी कठोरता त्यागकर कोमलता धारण कर ल‌िया ज‌िससे श्री कृष्‍ण के चरण च‌िन्ह उभर आए। चरण च‌िन्ह को देखकर भक्त भाव व‌िभोर हो उठते हैं।

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द्वर‌िकाध्‍ाीश्‍ा मंद‌िर
यह है गुजरात के जामनगर में स्‍थ‌ित द्वार‌िकाधीश मंद‌िर। इसे भगवान श्री कृष्‍ण की राजधानी कहते हैं। यहां आज भी श्री कृष्‍ण की सेवा उसी रूप में होती है जैसे श्री कृष्‍ण हमारे बीच अपने लीलामय रूप में मौजूद हों। इसे धरती का बैकुंठ भी कहते हैं।

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jagannath puri
ये है जगन्नाथ पुरी। कहते हैं यहां श्री कृष्‍ण आज भी अपनी बहन सुभद्रा और बलदेव जी के साथ न‌िवास करते हैं। हर साल श्री कृष्‍ण की रथयात्रा होती है। लेक‌िन इस यात्रा से पहले श्री कृष्‍ण बीमार भी हो जाते हैं इसल‌िए इनका उपचार क‌िया जाता है। यहां आकर आप खुद यह महसूस करेंगे क‌ि श्री कृष्‍ण अपने बीच हैं।
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अक्षय वट
द्वार‌िका और जगन्नाथ पुरी के बाद आइये अब कुरूक्षेत्र चलते हैं। यहां पर श्री कृष्‍ण ने गीता का उपदेश था। इस तस्वीर में देख‌िए अक्षय वट को कहते हैं श्री कृष्‍ण ने यहीं वट वृक्ष के नीचे अर्जुन को गीत का द‌िव्य ज्ञान द‌िया था।
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