आदि शंकर उस समय भारतवर्ष की यात्रा पर थे। यात्रा करते हुए वह नर्मदा तट पर स्थित ओंकारेश्वर के पास एक गांव में रुके। वहां एक स्नातक ने उनसे पूछा, प्रभो! मैं कौन-सी साधना करूं? आचार्य ने कहा, तुम तेज दौड़ो। दौड़ने से पहले निश्चित कर लो कि भगवान के लिए दौड़ रहे हो।
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स्नातक ने फिर पूछा, क्या कोई साधना बैठकर की जानेवाली नहीं है? आचार्य ने कहा, बैठो और निश्चय रखो कि भगवान के लिए बैठे हो। स्नातक ने फिर कहा, जप-ध्यान भी कर सकते हैं? इस प्रश्न पर ध्यान दिए बिना नर्मदा के उस पार खड़े एक साधक को आचार्य ने संकेत से बुलाया। बहाव तेज था। नौका के सहारे ही आया जा सकता था। वह भी नाविक हो तभी।
शिष्य साधक गुरु का संकेत पाकर चल दिया। नदी के किनारे पहुंचने का भी उसे भान नहीं रहा। यहां तक कि उसने धारा भी नहीं देखी और नदी में पैर रख दिया। पर यह क्या! शिष्य ने जहां पांव रखा, वहां एक कमल खिल आया। उस कमल की ओर देखे बिना साधक ने गुरु की ओर देखते हुए अगला पग उठाया, तो वहां भी एक कमल खिल उठा।
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गुरु से वितर्क कर रहे स्नातक ने देखा कि उस शिष्य ने जितने भी पग उठाए और धारा में जहां-जहां रखे, वहां फूल निकल आए हैं। उन फूलों की ओर ध्यान दिए बिना वह गुरु के पास पहुंच गया। अब उस स्नातक के पास पूछने के लिए कुछ भी नहीं रह गया था।