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पति ने दी सारी दौलत पत्नी ने कहा मुझे कुछ और चाहिए

Wed, 02 Jul 2014 11:59 AM IST
उपनिषद कथा
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ऋषि याज्ञवल्क्य का मन गृहस्थी से ऊब गया। अब वह गृहस्थ आश्रम में नहीं रहना चाहते थे। कहीं एकांत में संन्यस्त जीवन बिताना चाहते थे। इसके लिए जरूरी था कि जो संपत्ति पास थी, उसे उत्तराधिकारियों में बांट दें। उत्तराधिकारी के नाम पर पत्नी के अलावा कोई नहीं था। उन्होंने सारी संपत्ति दोनों पत्नियों-मैत्रेयी तथा कात्यायनी में बराबर-बराबर बांटने की सोची।
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उन्होंने पत्नियों को बुलाया और कहा, आज मैं अपनी इस संपत्ति को बराबर-बराबर तुम दोनों में बांट देता हूं। मेरे पास इस आश्रम में जो कुछ भी है, उसका एक भाग मैत्रेयी का और दूसरा कात्यायनी का।

कात्यायनी ने तो संतोष कर लिया। उसे आश्रम का प्रचुर भाग और सैकड़ों पशु, गाय, खेत और कुटियाएं मिली थीं। लेकिन मैत्रेयी के मन में अपने हिस्से की संपत्ति को लेकर संशय था। उसने ऋषि से पूछा, इस धन-संपदा पर अब मेरा अधिकार हो जाएगा। उसके बाद मैं आप जितनी समर्थ और समृद्ध हो जाऊंगी?
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ऋषि ने कहा, कह नहीं सकता कि तुम मेरी तरह हो सकोगी या नहीं। पर मेरे पास इसके बाद कुछ नहीं बचेगा। इसलिए स्वाभाविक ही तुम मुझसे ज्यादा धनवान होगी। मैत्रेयी ने फिर कहा, क्या मैं उस उपलब्धि की अधिकारी हो जाऊंगी, जिसके लिए आप यह सब छोड़कर जा रहे हैं? क्या मुझे वह परमपद मिलेगा, जिसके लिए आप इस वैभव का त्याग कर रहे हैं?

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याज्ञवल्क्य ने कहा, पृथ्वी की संपूर्ण धन-संपदा के बदले भी वह परमपद मिलनेवाला नहीं। यह सुनकर मैत्रेयी ने कहा, तब उसे लेकर मैं क्या करूं, जिससे परमपद नहीं मिलता। मुझे वह उपाय बताइए, जिसके लिए आप सब कुछ छोड़ रहे हैं। वही मेरा सच्चा भाग होगा। इस तरह वह अमृतभाग मैत्रेयी को मिला। याज्ञवलक्य ने उसे ब्रह्मविद्या की प्राप्ति का उपाय बताया।
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