जापान की प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षुणी वू जिंकांग तब अपने गुरु आचार्य हुइनेंग के आश्रम में ध्यान और स्वाध्याय कर रही थीं। साधना के क्रम में वह महापरिनिर्वाण सूत्र का नियमित पारायण करती थीं। उस सूत्र के कई अंशों के अर्थ उन्हें समझ नहीं आ रहे थे। आचार्य ने कहा हुआ था कि महापरिनिर्वाण सूत्र का पारायण करना है और उसके अर्थ भी समझना है।
कोई अंश समझ में नहीं आए और पारायण करते-करते बुरी तरह थक जाओ, तो मुझे बताना। भिक्षुणी वू जिंकांग ने एक दिन अपने गुरु से पूछा, सूत्र में कही कई बातों को समझ नहीं पा रही हूं। मुझे उनके बारे में बताएं।
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हुइनेंग ने कहा, मुझे पढ़ना नहीं आता है। अगर तुम मुझे समझ नहीं आ रहे अंश पढ़कर सुना दो, तो शायद मैं तुम्हें उनका अर्थ बता पाऊं। भिक्षुणी को आश्चर्य हुआ कि गुरु लिखना-पढ़ना नहीं जानते, फिर भी महापरिनिर्वाण सूत्र जैसे गूढ़ ग्रंथ का अर्थ समझाने की बात कह रहे हैं।
उन्होंने आखिरकार पूछ ही लिया, आपको लिखना-पढ़ना नहीं आता, फिर भी आप इन गूढ़ शास्त्रों का ज्ञान कैसे आत्मसात कर लेते हैं? हुइनेंग ने आकाश की तरफ उंगली उठाई और चंद्रमा की ओर इशारा करते हुए कहा, मेरी उंगली की सीध में तुम्हें क्या दिखाई देता है? भिक्षुणी ने कहा, चंद्रमा।
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मगर उंगली चंद्रमा नहीं है। चंद्रमा को देखने के लिए दृष्टि को उंगली के परे ले जाना पड़ता है। ऐसा ही है न, गुरु ने बताया। भिक्षुणी ने हामी भरी। हुइनेंग ने बोलना जारी रखा, सत्य शब्दों पर आश्रित नहीं होता। सत्य आकाश में दीप्तिमान चंद्रमा की भांति है, और शब्द हमारी उंगली हैं। इसलिए उंगली से इशारा करके आकाश में चंद्रमा की स्थिति आसानी से बताई जा सकती है। वू की जिज्ञासा का समाधान हो गया।