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लंबी जिंदगी जीना चाहेंगे या कामयाबी का एक दिन फैसला खुद कीजिए

Tue, 28 Jul 2015 11:36 AM IST
ओशो
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एक बगीचे में घास का एक छोटा-सा फूल दीवार की ओट में ईंटों के बीच अपने अन्य साथियों के साथ खिला रहता था। तूफान आते थे, उस पर असर नहीं होता था। सूरज निकलता था, उस फूल को फर्क नहीं पड़ता। वर्षा में वह न भीगता और न ही गर्मी में सूखता था, क्योंकि दीवार की ओट थी और ईंटों से बचाव था।
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पास ही गुलाब के फूल थे। उसकी सुंदरता और सुगंध से अभिभूत होकर वह सोचता कि काश, वह भी गुलाब होता। उसके संगी-साथी फूलों ने उसे समझाया कि गुलाब का फूल होने पर बड़ी तकलीफें हैं। तुम यहां बहुत सुरक्षित हो। किसी आफत को न्योता मत दो।

मगर घास के फूल ने कहा, बहुत दिन सुरक्षा में रह लिया, अब बाहर निकलने का मन होता है। उसने परमात्मा से प्रार्थना की कि उसे गुलाब का फूल बना दें; एक दिन के लिए ही सही। ईश्वर ने उसे वरदान दे दिया। और वह अगली सुबह गुलाब का फूल हो गया।
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सुबह से ही उसकी मुसीबतें शुरू हो गईं। जोर की आंधियां चलीं, उसके प्राण कांप उठे, जड़ उखड़ने लगी। दोपहर होते-होते सूरज तेज हुआ। फूल तो खिला था, लेकिन वह कुम्हलाने लगा। वर्षा शुरू हुई, तो पंखुड़ियां नीचे गिरने लगीं। धीरे-धीरे इतनी तेज बारिश होने लगी कि सांझ होते-होते वह जड़ से उखड़ गया और गुलाब के फूलों का वह पौधा जमीन पर गिर पड़ा।

जमीन पर गिरने के बाद वह अपने साथी फूलों के करीब आ गया। उन फूलों ने उससे कहा, पागल, हमने पहले ही कहा था। व्यर्थ अपनी जिंदगी गंवाई। मरते हुए उस गुलाब के फूल ने कहा, कोई बात नहीं। जिंदगी भर ईंट की आड़ में छिपे हुए घास का फूल होने से चौबीस घंटे के लिए गुलाब का फूल हो जाना ज्यादा अच्छा है।
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