बुद्ध अपने एक प्रवास में वैशाली आए। कहते हैं कि उनके साथ दस हजार शिष्य भी थे। सभी शिष्य प्रतिदिन भिक्षा मांगने जाते थे। वैशाली में ही आम्रपाली का महल भी था। वह वैशाली की सबसे सुंदर स्त्री और नगरवधू थी। एक दिन उसके द्वार पर एक भिक्षुक आया। उस भिक्षुक को देखते ही वह उसके प्रेम में पड़ गई।
उसके पीछे-पीछे वह अपना दान स्वीकार करने का आग्रह करते हुए दौड़ी। भिक्षा देने के बाद उसने कहा, तीन दिन बाद वर्षाकाल प्रारंभ होनेवाला है। आप उस अवधि में मेरे महल में ही रहें। भिक्षु ने कहा कि मुझे तथागत अनुमति देंगे, तो मैं यहां रुक जाऊंगा। बाहर निकलने पर उसने अपने साथी भिक्षुओं से आम्रपाली के निवेदन के बारे में बताया।
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उन्होंने बुद्ध को यह वृत्तांत बढ़ा-चढ़ाकर सुनाया। बुद्ध ने कुछ नहीं कहा। युवक भिक्षु आया और उसने बुद्ध के चरण स्पर्श कर सारी बात बताई। बुद्ध ने उसे कुछ पल देखा और आम्रपाली के महल में रहने की अनुमति दे दी। तीन दिन बाद युवक भिक्षु आम्रपाली के महल में चला गया। अन्य भिक्षु नगर में उस भिक्षु के बारे में चल रही चर्चाएं सुनाने लगे।
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बुद्ध ने कहा कि तुम सब अपनी चर्या का पालन करो। मुझे उस शिष्य पर विश्वास है। यदि उसका धर्म अटल है, तो आम्रपाली भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी। बस चार महीनों तक प्रतीक्षा कर लो। भिक्षुओं को बुद्ध की बात पर विश्वास नहीं हुआ। लेकिन वे कुछ कर भी नहीं सकते थे।
चार महीने बाद युवक भिक्षु लौट आया। पीछे-पीछे आम्रपाली भी आ गई। उसने बुद्ध से भिक्षुणी संघ में प्रवेश देने की आज्ञा मांगी। उसने कहा कि मैंने भिक्षु को पाने के हर संभव प्रयास किए, पर मैं हार गई। उसके आचरण ने बता दिया कि आपके चरणों में ही सत्य और मुक्ति का मार्ग है। मैं अपनी संपदा संघ के लिए दान में देती हूं।