बालक ईश्वरचंद्र अपने पिता ठाकुरदास के साथ वीरसिंह नामक गांव से कलकत्ता (अब कोलकाता) जा रहे थे। गांव से कलकत्ता तक पक्की सड़क थी। जब वे काफी दूर निकल गए, तो बालक का ध्यान जमीन में गड़े पत्थर की ओर गया, जिस पर काला-काला कुछ लिखा था। बालक ने उसे देखकर पूछा, पिताजी स्थान-स्थान पर ये पत्थर जमीन में क्यों गड़े हैं?
पिता ने समझाया, बेटा यह मील का पत्थर है। इससे किसी स्थान की दूरी ज्ञात होती है। इस पत्थर पर अंग्रेजी में लिखा है कि कलकत्ता यहां से ग्यारह मील है। लगभग दस मील की यात्रा बातचीत में निकल गई। मील का पत्थर आता और वह बालक यह पूछ लेता, पिताजी यह क्या लिखा है? इस प्रकार अंग्रेजी के अंकों की बनावट उसके मस्तिष्क में जमती जा रही थी और यात्रा के पूर्ण होने तक उसे अंग्रेजी की गिनती का पूरा अभ्यास हो गया।
शाम तक पिता-पुत्र कलकत्ता पहुंच गए और सेठ जगदुर्लभसिंह के यहां ठहरे। सुबह वे दोनों सेठ की दुकान पर गए। वहां सेठ ने ठाकुरदास को कुछ हिसाब मिलाने के लिए दिया। वह बालक भी पास में बैठकर सारा हिसाब देखता रहा। पिता ने जब हिसाब करके सेठ को वापस कर दिया, तो ईश्वरचंद्र ने कहा, पिताजी, यह हिसाब मुझे भी आता है।
बालक की बात सेठ ने सुनी, तो वह ठाकुरदास से पूछ बैठा, क्या आपके बेटे ने कहीं अंग्रेजी की शिक्षा भी ली है?
नहीं, ठाकुरदास का कहना था। जब यह एकाग्रचित्त होकर किसी कार्य को समझने का प्रयास करता है, तो उसे सीखने में देर नहीं लगती। इस प्रतिभा का कारण पूछने पर बालक ने कहा, पूरा ध्यान देने पर कठिन से कठिन कार्य भी सरल हो सकता है।
यही बालक बाद में ईश्वरचंद्र विद्यासागर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।