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मेढकों की उन परेशानियों को शिव भी दूर नहीं कर पाए

Wed, 11 Jun 2014 11:05 AM IST
निमाड़ी लोककथा
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किसी जमाने में एक बड़े-से तालाब में सैकड़ों मेंढक रहते थे। तालाब में कोई राजा नहीं था, यानी सभी राजा थे।  इसलिए वहां अराजक स्थिति पैदा हो गई थी। इससे बचने के लिए बूढ़े मेढकों ने भगवान शिव को तप से प्रसन्न कर लिया और कहा कि तालाब के लिए कोई राजा भेज दें।
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शिव ने अपने नंदी को भेज दिया। नंदी मेढकों की भाषा नहीं जानता था और न ही उनकी जरूरतें। परेशान होकर मेढकों ने फिर शिव से राजा बदलने की प्रार्थना की। शिव ने नंदी को वापस बुला लिया और गले के सर्प को तालाब का राजा बनाकर भेज दिया।

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सर्प अक्सर एक-दो मेढक चट कर जाता। इससे मेढ़कों में दहशत फैल गई। आखिरकार मेढकों ने घबराकर फिर से भोले शंकर को प्रसन्न किया और कहा कि अब किसी को राज करने के लिए भेजने के बजाय कोई यंत्र-मंत्र दे दें। शिव ने सर्प को वापस बुला लिया और अपनी शिला उन्हें पकड़ा दी।
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मेढक जैसे ही शिला को रखने लगे कि वह उनके हाथ से छूट गई और कई मेढक दबकर मर गए। मेढक फिर शिव के पास गए और कहने लगे, आपका भेजा कोई भी राजा हमारे तालाब में व्यवस्था नहीं बना पाया। समझ में नहीं आता कि हमारे कष्ट कैसे दूर होंगे। कोई यंत्र-मंत्र भी काम नहीं कर रहा है।

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शिव थोड़ा रुककर बोले, यंत्र-मंत्र छोड़ो और स्वतंत्र होकर कोई उपाय खोजो। मैं तुम्हें यही शिक्षा देना चाहता था। तुम्हें क्या चाहिए और तुम्हारे लिए क्या उपयोगी है, वह केवल तुम्हीं अच्छी तरह समझ सकते हो।

किसी भी तंत्र में बाहर से भेजा गया कोई भी शासक या नियम भले ही कितना ही अच्छा क्यों न हो, किसी के लिए भी अच्छा नहीं हो सकता। इसलिए अपना स्वाभिमान जागृत करो और अपनी गलतियों से सीखो।
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