थका-मांदा शिल्पकार रास्ते में दिखाई दिए छायादार वृक्ष के नीचे विश्राम के लिए बैठा। वह सुस्ता ही रहा था कि सामने पत्थर का एक टुकड़ा पड़ा दिखाई दिया। उसने पत्थर के टुकड़े को उठा लिया, और छेनी-हथौड़ी निकालकर उसे तराशने लगा। पहली ही चोट की थी कि पत्थर जोर से चिल्ला उठा।
शिल्पकार का ध्यान नहीं गया। दूसरी बार छेनी चला दी। इस बार तो पत्थर रो उठा। शिल्पकार ने पूछा, क्या हुआ, तो पत्थर कातर होकर कहने लगा कि चोट मत करो। दर्द होता है।
शिल्पकार ने उस पत्थर को छोड़ दिया। दूसरा टुकड़ा उठाया और उसे तराशने लगा। वह टुकड़ा चुपचाप वार सहता गया और देखते ही देखते उसे लगा कि उसका अस्तित्व मिट गया है। उसकी जगह एक देवी प्रतिमा उभर आई है। शिल्पकार प्रतिमा वहीं रख अपनी राह चला गया।
कुछ वर्षों के बाद शिल्पकार उसी रास्ते से गुजरा। उसी पेड़ के नीचे रुका। देखा कि नजारा ही बदला हुआ है। एक मंदिर बना हुआ है। लोग कतार लगाए खड़े हैं। वह भी कतार में खड़ा हो गया। उस देव प्रतिमा के पास पहुंचा, तो पहचान लिया कि यह तो वही पाषाण है, जिसे कुछ माह पहले उसने तराशा था।
उस प्रतिमा के पास ही पत्थर का वह पहला टुकड़ा भी पड़ा था, जिसे रोने पर फेंक दिया था। लोग उस पर नारियल तोड़ रहे थे और टूटे हुए टुकड़ों को फूलों के साथ प्रतिमा पर चढ़ा रहे थे।