संत नारायण दास को सिद्धि थी कि जब भी वह नाचते, तो बारिश हो जाती। लोगों को जब भी जरूरत होती, वे संत के पास जाते और उनसे मदद मांगते। एक बार शहर से पढ़े-लिखे चार लड़के गांव घूमने आए। उन्होंने संत नारायणदास के बारे में सुना, तो गांव वालों को चुनौती-सी देते हुए कहा कि यह संयोग ही होगा। अगर नाचने से बारिश होती है, तो हमारे नाचने से भी बारिश होगी।
संत को सारी बात बताई गई। उन्होंने तुरंत हामी भर ली, और कहा कि ठीक ही तो कह रहे हैं। लड़कों ने नाचना शुरू किया। आधा घंटा बीता कि पहला लड़का थककर बैठ गया। बादल नहीं दिखे। कुछ देर में दूसरा भी थक गया। एक घंटा बीतते न बीतते बाकी दोनों लड़के भी थक गए। पर बारिश नहीं हुई।
अब संत उठे। उन्होंने नाचना शुरू किया, तो आसमान में यकायक बादल छाने लगे। एकाध घड़ी में ही वे घटाटोप हो गए और बरसने लगे। जोरों की बारिश हुई, पर संत ने रुकने का नाम नहीं लिया। वहां मौजूद लोगों के अनुरोध करने पर ही वह रुके, बारिश भी थम गई।
लड़के दंग रह गए। उन्होंने संत से पूछा, बाबा ऐसी क्या बात है कि हमारे घंटों नाचने पर भी बारिश नहीं हुई और आपके शुरू करते ही मेघ बरसने लगे। संत ने कहा, मैं दो बातों का ध्यान रखता हूं। एक तो यह कि मुझे विश्वास है कि नाचूंगा, तो बारिश होगी। दूसरी यह कि जब तक बारिश न हो, नाचता ही रहूंगा।