सत्यकाम को चार सौ दुर्बल गायें सौंपकर गौतम ने कहा, तू इन्हें वन में चराने ले जा। जब तक इनकी संख्या एक हजार न हो जाए, वापस न लाना। सत्यकाम गायों को लेकर वन में गए, और तन-मन से गायों की सेवा में जुट गए। एक दिन उसी समूह के वृषभ (सांड) ने सत्यकाम को बताया कि हमारी संख्या एक हजार हो गई है। हमें आचार्य-कुल में पहुंचा दें। उसने सत्यकाम को ब्रह्म के एक चरण का उपदेश दिया, और कहा कि दूसरा चरण अग्नि बतलाएंगे।
सत्यकाम गायों को लेकर चले। संध्या होने पर विश्राम की व्यवस्था की। शीत और अंधकार से बचाव के लिए अग्नि जलाई। अग्नि ने उस समय ब्रह्म के द्वितीय पाद का उपदेश दिया और कहा कि अगला उपदेश हंस देगा। दूसरे दिन सत्यकाम एक जलाशय के किनारे ठहरे। वहां हंस ने और अगले दिन जल-मुर्ग ने क्रम से ब्रह्म के तीसरे और चतुर्थ पाद का उपदेश दिया। इस प्रकार परमात्मा का बोध और एक हजार गायों को लेकर वह आश्रम लौटे।
आचार्य गौतम ने उसके तेजपूर्ण दिव्य कांति को देखकर कहा कि तुम ब्रह्मज्ञानी की तरह दिख रहे हो। सत्यकाम ने पिछले चार दिन की घटनाएं सुनाईं और कहा कि सुना है, आचार्य द्वारा प्राप्त विद्या ही श्रेष्ठ होती है। मुझे आप ही पूर्णरूप से उपदेश दीजिए। आचार्य प्रसन्न हुए और बोले, वत्स। तुमने जो प्राप्त किया है, वही ब्रह्म-तत्त्व है। तुम सेवा के मार्ग से ही ब्रह्मविद हुए।