महर्षि मांडव्य का आश्रम अपने शिक्षा-संस्कार और अनुशासन के कारण बहुत प्रसिद्ध था। जिस समय की यह बात है, उस समय आश्रम में करीब तीन सौ छात्र पढ़ते थे। सुरक्षा-व्यवस्था का कोई जतन किया नहीं गया था, क्योंकि वहां संस्कारी लोग ही आते-जाते थे। कुलीन परिवारों और राजपुरुषों के आने-जाने से आश्रम में सदा चहल-पहल बनी रहती थी।
संस्कारी लोगों के आने-जाने से आश्रम का तेजोवलय समाज में बना हुआ था। उस वलय का फायदा उठाकर ही एक दिन कुछ डाकू किसी को लूटने के बाद आश्रम में आकर छिप गए। सिपाही उनके पीछे-पीछे आश्रम में आए और उन्होंने डाकुओं को पकड लिया। चूंकि महर्षि के आश्रम में डाकू पकड़े गए थे, इसलिए राजनियमों के अनुसार सिपाही महर्षि को भी पकड़कर ले गए। डाकुओं और उन्हें प्रश्रय देते प्रतीत हो रहे मांडव्य ऋषि को सजा सुनाने के लिए राजसभा में पेश किया गया।
जब अन्य ऋषियों को यह पता चला कि महर्षि मांडव्य पकड़ लिए गए हैं और उन्हें दंडित किया जा रहा है, तो वे राजा के पास गए। उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराया। महर्षि मांडव्य के बारे में बताया कि वह समाज और राज के लिए कितना उपयोगी काम कर रहे हैं, लोगों को न सिर्फ प्रभु की ओर प्रेरित कर रहे हैं, बल्कि समाज में धर्म-कर्म का प्रभाव बढ़ा रहे हैं। यह सुनकर राजा तुरंत राजगद्दी छोड़कर महर्षि मांडव्य के पास गए और उनसे माफी मांगने लगे।
महर्षि मांडव्य ने राजा से कहा, आपकी कोई गलती नहीं है, राजन। पिछले जन्मों में मैं पशु-पक्षियों को बहुत सताया करता था। उस पाप कर्म का दंड मुझे मिलना ही था। लेकिन इस जन्म में मैंने जो अच्छे काम किए थे, उनके कारण मेरी मौत टल गई।