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चावल के बदले दिया ऐसा दान जानकर हैरान रह जाएंगे

Thu, 31 Jul 2014 03:11 PM IST
जानकीनाथ शर्मा
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एक बालक विद्यालय पढ़ने जाता था। घर में उसकी मां के अलावा कोई नहीं था। मां अपने बेटे पर प्राण न्योछावर किए रहती थी, कोशिश करती कि उसे किसी तरह की कमी महसूस न हो। इसलिए उसकी हर मांग पूरी करती। पुत्र भी पढ़ने-लिखने में तेज और परिश्रमी था।
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खेल के समय खेलता, लेकिन पढ़ने के समय का ध्यान रखता। एक दिन दरवाजे पर किसी ने ‘माई! ओ माई!’ पुकारते हुए आवाज लगाई। मां किसी काम में लगी हुई थी। माई ओ माई की आवाज सुनकर बालक हाथ में पुस्तक पकड़े हुए द्वार पर गया। उसने देखा कि एक फटेहाल बुढ़िया कांपते हाथ फैलाए खड़ी थी। उसने कहा, ‘बेटा! कुछ भीख दे दे।

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बुढ़िया के मुंह से बेटा सुनकर बालक भावुक हो गया और भीतर आकर मां से कहने लगा,‘मां! एक गरीब मां मुझे बेटा कहकर कुछ मांग रही है!’ उस समय घर में कुछ खाने की चीज थी नहीं, इसलिए मां ने कहा, ‘बेटा! रोटी-भात तो कुछ बचा नहीं है, चाहो तो चावल दे दो।’
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पर बालक ने हठ करते हुए कहा- ‘मां! चावल से क्या होगा? तुम जो अपने हाथ में सोने का कंगन पहने हो, वही दे दो न उस बेचारी को। मैं जब बड़ा होकर कमाऊंगा, तो तुम्हें दो कंगन बनवा दूंगा।’ मां ने बालक का मन रखने के लिए सच में ही सोने का अपना वह कंगन कलाई से उतारा और कहा, ‘लो, दे दो’ बालक खुशी-खुशी वह कंगन उस भिखारिन को दे आया।

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भिखारिन को तो मानो एक खजाना ही मिल गया। कंगन बेचकर उसने परिवार के बच्चों के लिए अनाज, कपड़े आदि जुटा लिए। उसका पति अंधा था। उधर वह बालक पढ़-लिखकर बड़ा विद्वान हुआ, उसने काफी नाम कमाया। एक दिन वह मां से बोला, ‘मां! तुम अपने हाथ का नाप दे दो, मैं कंगन बनवा दूं।’

उसे बचपन का अपना वचन याद था। पर माता ने कहा, ‘उसकी चिंता छोड़। मैं इतनी बूढ़ी हो गई हूं कि अब मुझे कंगन शोभा नहीं देंगे। हां, कलकत्ता के तमाम गरीब बालक विद्यालय और चिकित्सा के लिए मारे-मारे फिरते हैं, उनके लिए तू एक विद्यालय और एक चिकित्सालय खुलवा दे, जहां नि:शुल्क पढ़ाई और चिकित्सा की व्यवस्था हो।’ मां के उस पुत्र का नाम था ईश्वरचंद्र विद्यासागर।
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