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कुछ नहीं होते हुए भी अकूत संपदा का मालिक

Thu, 31 Jul 2014 12:16 PM IST
नारायण स्वामी
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एक महर्षि थे। उनका नाम था कणाद। किसान जब अपना खेत काट लेते थे, तो उसके बाद जो अन्न के दाने खेतों में पड़े रह जाते थे, उन्हें बीनकर वह अपना जीवन चलाते थे। अनाज के दाने (कण) बीनकर आहार करने के कारण ही उनका नाम कणाद पड़ गया था। कणाद अर्थात जो कण भर खाता हो।
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जाहिर है, उन जैसा दरिद्र और कौन होगा! उस देश के राजा को कणाद के बारे में पता चला। उसने बहुत-सी धन-सामग्री लेकर अपने मंत्री को उन्हें भेंट करने के लिए भेजा। मंत्री पहुंचा, तो महर्षि ने कहा, मैं जैसा भी हूं, कुशल हूं। इस धन को तुम उन लोगों में बांट दो, जिन्हें इसकी जरूरत है।

मंत्री वह धन वापस लेकर लौट गया। राजा ने पूछा, तो कणाद की कही बात दोहरा दी। राजा को हैरानी हुई कि इतनी दौलत भी कोई लौटा सकता है! राजा ने मंत्री को एक बार फिर महर्षि के पास भेजा। महर्षि ने फिर मना कर दिया।
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मंत्री के लौट आने के बाद राजा ने सोचा कि कणाद शायद उनके हाथों ही भेंट लेना चाहते हों। इसलिए बार-बार वह प्रतिनिधि को लौटा रहे हैं। तीसरी बार राजा स्वयं उनके पास गया। वह अपने साथ बहुत-सा धन ले गया। उसने महर्षि से प्रार्थना की कि वह उसे स्वीकार कर लें, किंतु महर्षि ने कहा, तुम यह सारा धन उन लोगों को दे दो, जिनके पास कुछ नहीं है। मेरे पास तो सबकुछ है।

राजा को विस्मय हुआ। लौटकर उसने सारी बात अपनी रानी को बताई। रानी बोली, आपने भूल की। ऐसे साधु के पास कुछ देने के लिए नहीं, लेने के लिए जाना चाहिए।

राजा उसी रात महर्षि के पास गया और उनसे क्षमा मांगी। कणाद ने कहा, गरीब कौन है? मुझे देखो और अपने को देखो। बाहर नहीं, भीतर। मैं कुछ भी नहीं मांगता, कुछ भी नहीं चाहता। इसलिए अनायास ही सम्राट हो गया हूं।
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