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बंदर की यह कहानी बताती है, डर के आगे जीत है

Tue, 30 Jun 2015 11:59 AM IST
-शिवचरण शर्मा
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बंदरों का सरदार मरकट अपने बच्चे के साथ किसी बड़े से पेड़ की डाली पर बैठा हुआ था। बच्चा बोला, मुझे भूख लगी है, क्या आप मुझे खाने के लिए कुछ पत्तियां दे सकते हैं?
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मरकट मुस्कराया, मैं दे तो सकता हूं, पर अच्छा होगा कि तुम खुद ही अपने लिए पत्तियां तोड़ लो।

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बच्चा उदास हो गया और बोला, लेकिन मुझे अच्छी पत्तियों की पहचान नहीं है।

तुम्हारे पास एक विकल्प है, मरकट बोला, पेड़ की निचली डालियों से पुरानी कड़ी पत्तियां चुन सकते हो या ऊपर की पतली डालियों पर उगी ताजा-नरम पत्तियां।

बच्चा बोला, यह ठीक नहीं है। भला ये अच्छी-अच्छी पत्तियां नीचे क्यों नहीं उग सकतीं, ताकि सभी उन्हें खा सकें?

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यही तो बात है। अगर वे सबकी पहुंच में होतीं, तो उनकी उपलब्धता कहां हो पाती? उनके बढ़ने से पहले ही उन्हें तोड़कर खा लिया जाता! मरकट ने उसे समझाया।

लेकिन इन पतली डालियों पर चढ़ना खतरनाक हो सकता है। डाल टूट सकती है, पांव फिसल सकता है, नीचे गिरकर चोट लग सकती है, बच्चे ने चिंता जताई।

बंदर ने कहा, याद रखो, हम जितना खतरा समझते हैं, अक्सर उतना है नहीं। इस पर बच्चे ने कहा, ऐसा है, तो सभी बंदर ताजा पत्तियां तोड़कर क्यों नहीं खाते?

मरकट कुछ सोचकर बोला, क्योंकि ज्यादातर बंदरों को डरकर जीने की आदत पड़ चुकी होती है। वे कभी खतरा उठाकर वह पाने की कोशिश नहीं करते, जो वे पाना चाहते हैं। पर तुम ऐसा मत करना। अपने डर को जीतो और ऐसी जिंदगी जियो, जो तुम जीना चाहते हो!
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बच्चा समझ चुका था कि उसे क्या करना है। उसने तुरंत ही अपने डर को पीछे छोड़ा और ताजा-नरम पत्तियों से अपनी भूख मिटाई।
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