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बच्चों के साथ खेलना पसंद है तो यह बात आपको जरुर अच्छी लगेगी

Fri, 18 Sep 2015 01:10 AM IST
श्रीनरेंद्र दत्त
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एक बार पंचतंत्र के रचयिता विष्णु शर्मा बच्चों के साथ खेल रहे थे। तभी उनका एक मित्र वहां आ पहुंचा। विष्णु शर्मा को बच्चों के साथ खेलते देखकर वह बोला, पंडित जी, आप इतने महान विद्वान होकर भी बच्चों के साथ खेल रहे हैं? क्या आपको यह शोभा देता है? आप जैसे विद्वान को बच्चों के साथ खेलते देखकर मुझे अत्यंत अचरज हो  रहा है।
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यह सुनकर विष्णु शर्मा बोले, क्यों, इसमें अचरज की क्या बात है? खेलने से दिमाग स्वस्थ रहता है। खेल के माध्यम से व्यक्ति अपनी पीड़ा और दुख भूल जाता है।

इस पर उनके मित्र बोले, पर आप तो बड़े और महान लेखक हैं। खेलने से क्या आपका अमूल्य समय नष्ट नहीं होता? आप यह सोचिए न कि जितनी देर आप बच्चों के साथ खेल रहे हैं, उतनी ही देर में किसी अच्छी रचना का सृजन कर सकते हैं।

मित्र की बात पर विष्णु शर्मा मुस्कराने लगे और मित्र से बोले, तुम लेखक नहीं हो न, इसलिए इस तरह की बातें कर रहे हो, वर्ना तुम ऐसा कभी नहीं कहते। शायद तुम नहीं जानते कि बच्चों के साथ खेलकर, उनके बीच रहकर ही मैं उनके हाव-भाव को कुशलता से समझ कर अपनी रचना में उतार पाता हूं।
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बच्चों को जाने-समझे बिना भला उनके बारे में लिखना कैसे संभव है? अब तुम्हीं बताओ कि यदि तुम्हारा खाना खाने का मन हो और तुम्हें खाना बनाना न आता हो, तो क्या तुम अच्छा खाना बना पाओगे?

मित्र बोला, नहीं पंडित जी, मैं आपकी बात का अर्थ समझ गया। आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। बच्चों के लिए लिखने से पहले वाकई उनके भाव और कल्पनाओं का ज्ञान जरूरी है। मैं भी इसका ध्यान रखूंगा। यह कहकर उनका मित्र चला गया और विष्णु शर्मा फिर से बच्चों के साथ खेलने में रम गए।
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