तीर्थंकर महावीर से एक जिज्ञासु ने पूछा, विभिन्न धर्मशास्त्रों में धर्म-कर्म के तरह-तरह के साधन बताए गए हैं। आपकी दृष्टि में धर्म की क्या व्याख्या है? महावीर कहते हैं, अहिंसा, क्षमा, दया, सत्य, शौच (पवित्रता), संयम, तप, त्याग, विनयशीलता, निष्कपटता आदि धर्म के लक्षण हैं।
कर्मकांड को धर्म समझना भ्रम है। जो व्यक्ति दूसरे के दुख को देखकर दुखी हो जाता है और उसके हृदय में करुणा उत्पन्न हो जाती है, वह धार्मिक है। जो व्यक्ति किसी भी प्रकार का उत्पीड़न सहन करने के बाद भी अहिंसा पर अटल रहकर क्रोध को पास नहीं फटकने देता, उसे धर्मशास्त्रों में आदर्श क्षमाशील कहा गया है।
महावीर कहते हैं, जीव जन्म, जरा और मरण से होने वाले दुख को जानता है, उसका विचार भी करता है, किंतु विषयों से विरत नहीं हो पाता। माया की गांठ सुदृढ़ होती है। आत्मा को दूषित करने वाले भोग-विलासों में निमग्न, शरीर को जर्जर करने वाले दुष्कर्मों में रत अज्ञानी और मूढ़ जीव उसी तरह कर्मों में बंध जाता है, जैसे मीठे रस में मक्खी।
खुजली होने पर जैसे खुजलाने के दुष्परिणाम को व्यक्ति सुख मानता है, वैसे ही मोहातुर मनुष्य कामजनित दुख को ही सुख मानकर उसमें लिप्त रहता है। जन्म, बुढ़ापा, रोग, मृत्यु सभी दुख हैं और संसार दुख की खान। जीवन को सार्थक करने का साधन न जानने के कारण मूढ़ व्यक्ति मृत्यु तक दुखरूपी संसार की यातनाएं सहन करता रहता है।
जो व्यक्ति मिथ्या तत्व से ग्रस्त होता है, उसकी दृष्टि विपरीत हो जाती है। उसे धर्म के कार्य अच्छे नहीं लगते।