ऋग्वेद का एक मंत्र है- मनुर्भव अर्थात मनुष्य बनो। वैदिक विद्वान वेदमूर्ति पंडित सातवलेकर ने एक सभा में जब यह मंत्र दोहराया, तो एक सज्जन ने पूछा, क्या सभा में उपस्थित लोग मनुष्य नहीं हैं? पंडित जी ने कहा, हर जीव के कुछ लक्षण होते हैं। यदि मानवता नहीं है, तो कोई मानव कैसे कहला सकता है? लक्षणों से ही तो सुर-असुर के भेद को जाना जा सकता है।
स्वामी विवेकानंद अमेरिका गए हुए थे। भोग-विलास में आकंठ डूबे वहां के लोगों को सार्वजनिक स्थलों पर मर्यादाहीनता का खुला प्रदर्शन करते देख वह हतप्रभ रह गए। उन्होंने भी वहां एक समारोह में वेद मंत्र मनुर्भव का उच्चारण करने के बाद कहा, केवल मानव योनि में पैदा हो जाने से ही किसी को मानव नहीं माना जा सकता।
हमारी भारतीय संस्कृति में धर्मेण हीनः पशुभि समानः कहकर कुछ नियमों का पालन करने वाले को ही मानव बताया गया है। उन्होंने विस्तार से बताया कि जिस व्यक्ति के हृदय में दया, करुणा नहीं है, जिसका जीवन संयमपूर्ण नहीं है, जो धर्म अर्थात कर्तव्यों का पालन नहीं करता, उसे मनुष्य कैसे कहा जा सकता है।
स्वामी रामतीर्थ ने भी कहा था, गुण एवं कर्म के आधार पर ही मनुष्य को इस लोक में मानव अथवा दानव की संज्ञा मिलती है। इसलिए किसी को क्रूरतम दुष्कर्म करते देखकर सहसा मुख से निकल जाता है- यह तो पशु से भी गया-बीता है।