आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती अपने प्रवचनों में ईमानदारी से अर्जित अपनी आय का कुछ अंश सेवा-परोपकार आदि कार्यों में खर्च करने की प्रेरणा दिया करते थे। एक बार वैदिक धर्म का प्रचार करते हुए वह एक नगर में पहुंचे। उनके प्रवचनों का श्रोताओं पर तत्काल प्रभाव पड़ा।
उस नगर के एक परिवार का मुखिया उनके पास पहुंचा। उसने उन्हें प्रणाम करने के बाद कहा, आपके प्रवचनों ने मेरी आंखें खोल दीं। मैंने अपनी पूरी जवानी घर-गृहस्थी के पचड़े में खर्च कर व्यर्थ गंवा दी। अब मैं सांसारिक झंझटों से मुक्ति पाने के लिए अपनी दुकान बेचकर धन आर्य समाज को समर्पित करना चाहता हूं।
स्वामी जी ने उससे पूछा, तुम्हारे परिवार में कौन-कौन हैं? उसने जवाब दिया, पत्नी और दो बच्चे। स्वामी जी ने उसे समझाते हुए कहा, वैदिक धर्म में गृहस्थी के पालन को श्रेष्ठ धर्म बताया गया है। गृहस्थ आश्रम में रहकर माता-पिता, पत्नी और बच्चों की देखभाल करना परम दायित्व है। अब यदि तुम आवेश में आकर दुकान बेच डालोगे, तो यह धर्म नहीं, अधर्म माना जाएगा। गृहस्थ का धर्म यह है कि वह ठीक ढंग से परिवार का पोषण करे। हां, यह जरूरी है कि आय का कुछ भाग धार्मिक कार्यों पर खर्च करे।
वह स्वामी जी की बातें सुनकर हतप्रभ रह गया। उसने दुकानदारी करते हुए ही धर्म प्रचार में सहयोग देते रहने का तत्क्षण संकल्प लिया।