गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर अक्सर दिव्यता, अस्तित्व, प्रकृति और सौंदर्य जैसे विषयों पर कहते-लिखते थे। हालांकि यह कहा जाता है कि शुरुआती दिनों में उन्हें इन विषयों का कोई अनुभव नहीं था। इसका भान उन्हें कैसे हुआ, इसके पीछे एक दिलचस्प कहानी है।
उनके पास एक बुजुर्ग व्यक्ति रहा करते थे। उनकी प्रवृत्ति अध्यात्म की ओर थी। जब भी टैगोर कहीं भाषण देने जाते, तो वह सज्जन भी पहुंच जाते और उन्हें देखते रहते। भाषण देते हुए टैगोर जब भी उनकी तरफ देखते, तो असहज हो जाते। असल में, वह सज्जन मौका मिलते ही टैगोर से सवाल करने लगते कि तुमने कह तो दिया, पर इस बारे में कुछ जानते भी हो।
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टैगोर महान कवि थे। जब वह कविता पढ़ते, तो ऐसा नहीं लगता था कि बिना अनुभव के उन्होंने कविताएं लिखी होंगी। फिर भी गुरुदेव की नजरें उस बुजुर्ग से मिलतीं, तो वह सकपका जाते। हालांकि धीरे-धीरे उनके भीतर भी इसे लेकर एक खोज जारी हो चुकी थी कि आखिर वह क्या है, जिसके बारे में वह मंचों से बातें तो करते हैं, लेकिन जानते नहीं।
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एक दिन बारिश हुई और फिर रुक गई। टैगोर को नदी के किनारे सूर्यास्त देखना बहुत अच्छा लगता था। उस दिन भी वह सूर्यास्त देखने के लिए नदी किनारे जा रहे थे। रास्ते में जगह-जगह गड्ढे थे, जो पानी से भरे थे। टैगोर उन गढ्ढों से बचते हुए आगे बढ़ रहे थे।
तभी उनका ध्यान पानी से भरे एक गढ्ढे पर गया। उन्होंने देखा और जैसे सारा आकाश उनके सामने प्रतिबिंबित हो गया। उन्हें कुछ आंतरिक अनुभव हुआ और वह सीधे उस बुजुर्ग के घर गए। बुजुर्ग ने दरवाजा खोला और एक नजर टैगोर को देखा। फिर वह बोला, अब तुम जा सकते हो। तुम्हारी आंखें कह रही हैं कि तुम सच जान चुके हो।