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समय की कमी होने पर कैसे करें भगवान का ध्यान जानें कबीर दास से

Thu, 02 Jul 2015 07:02 PM IST
ओशो
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संत कबीर उस समय कपड़ा बुन रहे थे। काशी के एक बड़े विद्वान जयंत आचार्य उनके पास पहुंचे। वह कबीर के ज्ञान और संत भाव की ख्याति सुनकर आए थे। वह सोच रहे थे कि उनका अनूठा वेश-विन्यास होगा। लेकिन उन्होंने देखा कि कबीर तो अत्यंत साधारण वेश में हैं।
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बातचीत करने पर उन्हें पता चला कि कबीर अत्यधिक साधारण हैं और दिन भर दुनियादारी के कामों में व्यस्त रहते हैं। रहा न गया, तो उन्होंने पूछ ही लिया, आप दिन भर कपड़ा बुनते रहते हैं, तो ईश्वर का स्मरण कब करते हैं? कबीर जयंत आचार्य को अपने साथ लेकर झोपड़ी से बाहर आए। वह बोले, यहां खड़े रहो।

तुम्हारे सवाल का जवाब देता नहीं, दिखाता हूं। कबीर ने उन्हें दिखाया कि एक औरत पानी का गागर सिर पर रखकर लौट रही थी। उसके चेहरे पर प्रसन्नता और चाल में रफ्तार थी। गागर को उसने पकड़ नहीं रखा था, फिर भी वह पूरी तरह संभली हुई थी। कबीर ने जयंत आचार्य से कहा, उस औरत को देखो।
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वह जरूर कोई गीत गुनगुना रही है। शायद कोई प्रियजन घर आया होगा। वह प्यासा होगा, उसके लिए वह पानी लेकर जा रही है। अब बताओ कि उसे गागर की याद होगी या नहीं? जयंत आचार्य ने जवाब दिया, उसे गागर की याद नहीं होती, तो अब तक तो वह नीचे गिर चुकी होती।

सुनते ही कबीर तपाक से बोले, यह साधारण-सी औरत सिर पर गागर रखकर रास्ता पार करती है। मजे से गीत गाती है, फिर भी गागर का ख्याल उसके मन में बराबर बना हुआ है। अब भी तुम समझते हो कि परमात्मा के स्मरण के लिए मुझे अलग से वक्त निकालने की जरूरत है? कपड़ा बुनने का काम शरीर करता है, आत्मा नहीं। इसलिए ये हाथ भी आनंदमय होकर कपड़ा बुनते रहते हैं।
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