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खुद की संतान नहीं होने पर धन संपत्ति का क्या किया जानकर हैरान रह जाएंगे

Wed, 01 Jul 2015 12:34 PM IST
-विट्ठलदास चौबे
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राजा महेंद्र प्रताप के पास अथाह संपदा थी, मगर उम्र बीतने पर भी उनकी कोई संतान नहीं हुई। निस्संतान महाराज के पास ब्रज के कुछ ज्योतिषी पहुंचे। राजा के शुभचिंतक ही उन्हें महल में लेकर आए थे। उन ज्योतिषियों में से एक ने कहा, महाराज, आपके भाग्य में पुत्र नहीं है। हालांकि आप पुत्रेष्टि यज्ञ करें, तो अवश्य पुत्र होगा।
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उन ज्योतिषी का नाम शायद पंडित मधुकर शास्त्री था। राजा साहब ने उनसे उपाय बताने के लिए धन्यवाद कहा और उसे अमल में नहीं लाने के लिए क्षमा मांगी। शास्त्री जी को संबोधित करते हुए राजा महेंद्र प्रताप ने कहा, मुझे इसका अफसोस है कि आपको व्यर्थ मुझ जैसे व्यक्ति के पास आकर अपना बहुमूल्य समय नष्ट करना पड़ा। इसके लिए मुझे क्षमा करें।

मुझे अपना वंश चलाने के लिए कोई जीवधारी रूपी बेटा नहीं चाहिए। जो राशि बेटे पर खर्च होती, उसे मैं शिक्षा संवर्धन में लगाऊंगा। वृंदावन रोड पर महाराज की खूब जमीन पड़ी थी। उसका कोई उपयोग नहीं होता था। राजा महेंद्र प्रताप ने उस जमीन पर नींव खुदवाई और भवन बनवाने का काम शुरू किया।
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यह बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों की बात है। महाराजा महेंद्र प्रताप का सपना 1909 में पूरा हुआ। रियासत की बेशकीमती 27 एकड़ जमीन उन्होंने महाविद्यालय के लिए दे दी और जब वह बनकर तैयार हो गया, तो उन्होंने घोषणा की कि महाविद्यालय ही मेरा परिवार और अगली पीढ़ी है।

इसी से मेरे उत्तराधिकारी सामने आएंगे। राजा साहब ने वृंदावन में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की। उसे ही अपना बेटा माना व लाखों की संपत्ति उसे दे गए। विरासत में उन्होंने लिखा कि मेरा वंश यह प्रेम महाविद्यालय ही आगे चलाएगा। समाज में शिक्षा के प्रसार की प्रवृत्तियां चल पड़े, तो मैं समझूंगा कि मेरा पुत्र सपूत निकला।
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