बसरा की संत राबिया की हरकतें और बातें आसानी से समझ में नहीं आती थीं, फिर भी लोग उन्हें गंभीरता से सुनते थे। कहते हैं कि वह सूरज की रोशनी की तरह अपनी बातों से उजाला फैलाया करती थी।
एक बुजुर्ग आदमी था, जो हमेशा फरमाया करता था कि कोई जब तकलीफ में किसी का दरवाजा खटखटाता है, तो आखिर किसी न किसी वक्त वह खुल ही जाता है। राबिया ने जब यह सुना, तो जवाब में कहा कि जो कभी बंद ही नहीं हुआ, तो उसके खुलने, न खुलने का सवाल ही कहां पैदा होता है।
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उस बुजुर्ग ने कहा कि लोगों के दरवाजे तो हमेशा बंद रहते हैं। तो राबिया ने कहा कि वह तुम्हारे भीतर ही तो रहता है, जिसने दरवाजा खुला रखा है। उस बुजुर्ग को यह बात गले नहीं उतरी। कुछ महीनों बाद वह व्यक्ति राबिया को सामने देखते ही रट लगाने लगा-हाय गम, हाय गम।
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राबिया तुरंत उस बुजुर्ग के पास गई और कहने लगीं, 'हाय गम' कहने के बगैर गम बगैर गम कहकर सजदा करो, क्योंकि अगर गम का जायका मिल जाता, तो तुम बोल ही न पाते। राबिया ने उसे एक व्यक्ति का वाकया सुनाया, जो अपने सिर पर पट्टी बांधे हुए था। वह मारे दर्द के चीख रहा था।
राबिया को देखकर पता नहीं क्या हुआ कि वह चुप हो गया। राबिया ने उसके सिर पर बंधी पट्टी की ओर इशारा कर कहा कि अभी तो तुम कराह रहे थे। फिर अचानक क्या हुआ। उस आदमी से उसने पूछा कि तुमने अपनी पट्टी क्यों खोल दी।
इस पर उस व्यक्ति का जवाब था कि मेरी उम्र तीस साल है। तुम जब यहां से गुजरी, तो हवाओं ने जैसे मुझसे कहा कि अपनी उम्र के तीस वर्षों में मैंने सेहतमंद होने की पट्टी नहीं बांधी, तो फकत एक बार के सिर दर्द में शिकायत की पट्टी क्यों बाधनी चाहिए।