एक विशाल पेड़ पर कई हंस रहा करते थे। उनमें एक बहुत बुद्धिमान और दूरदर्शी था। एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते देखा, तो दूसरे हंसों को बुलाकर कहा, इस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी। हंसों को यकीन नहीं हुआ, और किसी ने भी उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया।
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समय बीतता रहा। बेल लिपटते-लिपटते ऊपर शाखों तक पहुंच गई। बेल का तना मोटा होने लगा और पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई, जिस पर आसानी से चढ़ा जा सकता था। एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे, तब एक बहेलिया उधर आ निकला। पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढ़कर जाल बिछाया और चला गया।
शाम को सारे हंस वापस पानी में उतरे, तो बहेलिए के जाल में फंस गए। जब वे जाल में फंस गए, तो उन्हें उस बुद्धिमान हंस की बातें याद आईं। सब उसकी बात न मानने के लिए लज्जित थे। वह बुद्धिमान हंस चुपचाप बैठा था। एक हंस ने हिम्मत करके कहा, ताऊ, हम मूर्ख हैं, लेकिन अब हमसे मुंह मत फेरो।
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दूसरे हंसों ने भी इसी तरह का अनुरोध किया। तब उस हंस ने बताया, सुबह जब बहेलिया आएगा, तब सभी मुर्दा होने का नाटक करना। मुर्दा समझकर वह हमें जाल से निकालकर जमीन पर रखता जाएगा। जैसे ही वह अंतिम हंस को नीचे रखेगा, मैं आवाज दूंगा। आवाज सुनते ही सब उड़ जाना।
सुबह बहेलिया आया। हंसों ने वैसा ही किया। सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझकर जमीन पर पटकता गया, और अंतिम हंस के साथ ही बुद्धिमान हंस की आवाज सुनकर सभी हंस उड़ गए। बहेलिया अवाक होकर देखता रह गया।