भगवान बुद्ध अपने पिछले एक जन्म में जंगली भैंसे की योनि में थे। वह उससे पहले के अपने जन्म के किन्हीं कर्मों का फल भोग रहे थे। कर्मफल के चलते भैंसे की योनि में होते हुए भी वह शांत स्वभाव के थे। जंगल में एक नटखट बंदर उनका हमजोली था। उसे भगवान बुद्ध को तंग करने में बड़ा मजा आता। वह कभी उनकी पीठ पर सवार हो जाता, तो कभी पूंछ से लटक कर झूलता। कई बार गर्दन पर बैठकर दोनों हाथों से सींग पकड़ कर झकझोरता। बुद्ध उसे कुछ न कहते।
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उनकी सहनशक्ति और वानर की धृष्टता देखकर देवताओं ने उनसे निवेदन किया, शांति के अग्रदूत, इस नटखट बंदर को दंड दीजिए। यह आपको बहुत सताता है। भगवान बुद्ध ने देवताओं की बात हंसी में टाल दी। देवताओं ने आगे कहा, हे बोधिसत्व, हमें बताइए कि आप इस बंदर का उत्पीड़न क्यों सह रहे हैं?
बुद्ध ने कहा कि मैं इसे सींग से चीर सकता हूं, माथे की टक्कर से पीस सकता हूं, मगर मैं ऐसा नहीं करूंगा। अपने से बलशाली के अत्याचार को सहने की शक्ति तो सभी जुटा लेते हैं, पर सच्ची सहनशक्ति तो अपने से बलहीन की प्रताड़ना सहन करने में है। फिर उन्होंने देवों के अधिपति को जातिस्मरण (पूर्वजन्म की स्मृति) में उतरने के लिए कहा।
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देवाधिपति ने देखा कि बंदर पिछले एक जन्म में काल बहेलिया था और बुद्ध सामान्य व्यक्ति। बुद्ध को एक सांप ने काटा और काल बहेलिये ने उपचार कर उन्हें बचाया। वह बहेलिया ही इस जन्म में बंदर बना है और स्वभाव के कारण बुद्ध को परेशान कर रहा है। भैंसे की योनि में आए बुद्ध ने देवताओं से कहा, यह वानर मुझे परेशान नहीं कर रहा, बल्कि अपनी प्रकृति के अनुसार मुझसे स्नेह व्यक्त कर रहा है।