एक सिद्धयोगी बाबा ओंकारनाथ नदी में स्नान कर रहे थे। एक चुहिया पानी में बहती हुई आई। उसे निकाल कर बाबा अपनी कुटिया में ले आए। सिद्धपुरुष की करामातें देखकर वह बड़ी होने लगी। एक दिन वह बोली, बाबा, मेरा विवाह करा दीजिए।
संत ने उसे सूरज को दिखाया और कहा, इससे विवाह करा दें? चुहिया बोली, यह तो आग का गोला है। मुझे तो ठंडे स्वभाव का पति चाहिए। संत ने बादल के बारे में पूछा, तो चुहिया ने वह वर भी नहीं जंचने की बात कही। वह उससे बड़ा दूल्हा चाहती थी। संत ने पवन को बादल से बड़ा बताया, जो देखते-देखते उसे उड़ा ले जाता है। उसने उससे भी बड़ा पर्वत बताया, जो हवा को रोककर खड़ा हो जाता है।
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चुहिया ने इन्हें भी अस्वीकार कर दिया। बाद में वह खीझकर सिद्धयोगी से बोली, आपकी सिद्धि काम नहीं कर रही, बाबा। जप-तप सब बेकार जा रहा है। आप मेरे लिए उपयुक्त वर तक नहीं तलाश पा रहे हैं। बाबा कुछ बोले तो नहीं, पर चुहिया के उलाहने से खिन्न हो उठे। दो-तीन दिन बाद बाबा के गुरुभाई योगी श्यामस्वामी आए। ओंकारनाथ ने उन्हें चुहिया की दुविधा बताई। वह सुनकर श्यामस्वामी ने कुछ परामर्श दिया।
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एक दिन बाबा ओंकारनाथ ने पूरे जोश-खरोश से पहाड़ में बिल बनाने की कोशिश कर रहे चूहे को देखा। चुहिया ने भी उसे देखा, और सिद्धयोगी की ओर देखने लगी। योगी ने उसके बारे में यों ही पूछ लिया। चुहिया बोली, चूहा तो पर्वत से भी श्रेष्ठ है। वह बिल बनाकर पर्वतों की जड़ खोखली करने और उन्हें लुढ़का देने में समर्थ है।
बाबा ओंकारनाथ ने उस चूहे से चुहिया की शादी रचा दी। मनुष्य के संदर्भ में स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने भी कहा है कि मनुष्य को इसी तरह अच्छे अवसर मिलते हैं, पर अपनी मनःस्थिति के अनुसार ही वह चुनाव करता है।