शाम के वक्त दो बौद्ध भिक्षु आश्रम लौट रहे थे। अभी-अभी बारिश हुई थी और रास्ते पर जगह-जगह पानी जमा हुआ था। चलते-चलते उन्होंने देखा कि एक खूबसूरत युवती किनारे खड़ी है, और बारिश की वजह से रास्ते के आर-पार हो रही पानी की तेज धार को पार करने की कोशिश कर रही है। वहां पानी अधिक भरा हुआ था और उस पार जाना आसान नहीं था। युवती को खड़ा देखकर बौद्ध भिक्षु रुके। कुछ पल इंतजार किया कि वह मदद के लिए कहे, लेकिन जब वह चुप रही, तो उन्होंने उचित समझा कि खुद ही जाकर उस युवती से पूछ लें।
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दोनों में से बड़ा बौद्ध भिक्षु उस युवती के पास गया। उससे सहयोग की पेशकश की। युवती ने बताया कि उसकी मां घर पर बीमार है और वह कुछ औषधियां लेकर जल्दी ही उनके पास पहुंचना चाहती है। मगर पानी अधिक होने की वजह से वह उस पार नहीं जा पा रही। यह वृत्तांत सुनकर उस बौद्ध भिक्षु ने युवती को गोद में उठाया और दूसरी ओर ले आया। वह युवती चुपचाप चली गई।
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दोनों भिक्षु भी अपने आश्रम आ गए। शाम में आश्रम के सभी भिक्षु मुख्य सभागार में ध्यान के लिए इकट्ठा हुए। एक घड़ी का ध्यान-अभ्यास पूरा हुआ। इसके बाद दिन भर के कृत्यों की समीक्षा शुरू हुई। सबने दिन भर की खास घटनाओं का जिक्र किया। लेकिन छोटे भिक्षु ने बारिश से भीगती युवती को उठाकर सड़क के उस पार ले जाने की घटना का जिक्र किया और कहा कि भिक्षु होने के नाते हमें किसी औरत को छूना नहीं चाहिए था।
बड़ा भिक्षु चुप ही रहा। आचार्य ने छोटे भिक्षु को इंगित करते हुए कहा, तुम्हारे साथी ने तो युवती को रास्ता पार कर छोड़ दिया था, पर तुम तो अब भी उसे उठाए हुए हो।