खुरासान के शाह उमर की जिंदगी ठाट-बाट की थी। युद्ध के समय भी शानो-शौकत में कोई कसर नहीं रहती थी। उनकी शान में कोई तीन-साढ़े तीन सौ ऊंटों पर सामान लदा होता। एक युद्ध में वह खलीफा इस्माइल द्वारा बंदी बना लिए गए। उन्हें जेल में डाल दिया गया।
जाहिर है कि जेल में वह अकेले ही रखे गए। शाम तक भूख लगी। कोई बांदी या गुलाम तो साथ था नहीं। ऊंटों पर लदे माल-असबाब का एक कण भी पास नहीं था। पास खड़े जेल के मुख्य रसोइए से उन्होंने कहा, भाई, कुछ खाने को तो तैयार कर दो।
रसोई में एक मांस का टुकड़ा बचा था। रसोइए ने उसे ही देगची में पकने के लिए रख दिया। फिर रोटी के लिए आटा वगैरह तलाशने निकला। तभी एक कुत्ता वहां से गुजरा। मांस की गंध से रीझ कर उसने अपना मुंह देगची में डाल दिया। उसका मुंह जलने लगा। वह तेजी से और कुछ इस तरह पीछे हटा कि देगची उसके गले में अटक गई। घबरा कर वह देगची के साथ ही वहां से भागा।
उमर ने जब उसे इस हाल में देखा, तो उन्हें जोर से हंसी आ गई। चौकसी के लिए तैनात अधिकारी ने उनसे पूछा, दुख की इस घड़ी में भी आप हंस रहे हैं? कुत्ते की ओर इशारा करते हुए उमर ने कहा, मुझे यह सोचकर हंसी आ रही है कि सुबह तक मेरी रसोई का सामान ढोने के लिए तीन सौ ऊंटों की जरूरत होती थी। अब उसके लिए एक कुत्ता ही काफी है।