महात्मा बुद्ध ने नियम बनाया था कि भिक्षु मांस नहीं खाएंगे। यह नियम उनके बनाए दस शील में शामिल था। एक दिन दो भिक्षु शहर में भिक्षा मांगने गए।
दिन भर उन्हें खाने के लिए कुछ नहीं मिला। संघ का नियम था कि भिक्षा में जो भी मिलता, उसे बुद्ध के चरणों में रख दिया जाता था। वह भोजन बांट दिया जाता।
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उस दिन दोनों भिक्षु खाली हाथ ही लौट रहे थे। उसी समय एक कौवा मांस का एक टुकड़ा पंजों में दबाए आसमान में उड़ रहा था। अचानक उसके पंजों से मांस का वह टुकड़ा छूटा और सीधा भिक्षु के पात्र में आ गिरा।
भिक्षुओं के सामने अजीब दुविधा आ गई। नियम के अनुसार, उनके लिए मांस खाना वर्जित था और अनायास प्राप्त हुआ भोजन छोड़ा भी नहीं जा सकता था।
इस दुविधा के साथ वे गौतम बुद्ध के पास आए। बुद्ध भी पल भर के लिए दुविधा में पड़ गए। स्थिति विकट थी। वह सोचने लगे कि कहां किसी भिक्षु के पात्र में कौए के पंजे से मांस गिरने की घटना होती है। कभी-कभार, हजार-लाख संयोगों में ऐसा कोई योग बनता होगा।
अगले दो-ढाई हजार वर्षों में किसी और कौवे का किसी दूसरे भिक्षु के पात्र में मांस का टुकड़ा गिराने की संभावना क्या है? करोड़ों में एक मौका ऐसा हो सकता है।
यह सब सोचकर उन्होंने कहा, ‘तुम उसे खा लो। एक भिक्षु को भोजन का चुनाव नहीं करना चाहिए। इसलिए भिक्षापात्र में गिरा मांस खाया जा सकता है।
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लेकिन उसके बाद यह नजीर बन गई कि खुद चुनकर मांस नहीं खाना है। अनायास अथवा संयोगवश प्राप्त हो जाए, तो सामिष भोजन किया जा सकता है। यह नजीर इतनी प्रभावी हो गई कि बुद्ध के बनाए दस शीलों में से एक-मांस का सेवन नहीं करने का नियम तिरोहित ही हो गया।