विजया एकादशी का महत्व
विजया एकादशी का निर्जल व्रत एवं पूरे विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करने से जातक के जीवन में सुख, शांति एवं खुशहाली आती है एवं जीवन में आई नकारात्मकता समाप्त होती है। विजया एकादशी व्रत के बारे में शास्त्रों में लिखा है कि यह व्रत करने से स्वर्णणदान,भूमि दान,अन्न दान और गौ दान से अधिक पुण्य फलों की प्राप्ति होती है और अंततः उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यदि कोई आपसे शत्रुता रखता है तो विजया एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए।
पूजाविधि
इस दिन समस्त कामनाओं तथा सिद्धियों के दाता क्षीरसागर में शेषनाग शैया पर विराजमान भगवान श्री नारायण की उपासना करनी चाहिए। पूजा स्थल के ईशान कोण में एक वेदी बनाकर उस पर सप्त धान रखें एवं इस पर जल कलश स्थापित कर इसे आम या अशोक के पत्तों से सजाएं। तत्पश्चात भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित कर पीले पुष्प, ऋतुफल, तुलसी आदि अर्पित कर धूप-दीप व कपूर से भगवान विष्णु की आरती करें। इस दिन विष्णुजी के मंदिर में दीपदान करना बहुत शुभ माना गया है। इस दिन हरि भक्तों को परनिंदा,छल-कपट,लालच,द्वेष की भावनाओं से दूर रहकर श्री नारायण को ध्यान में रखते हुए यथाशक्ति विष्णुजी के मंत्र 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करना चाहिए।
विजया एकादशी की कथा
कथा के अनुसार त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के वनवास काल के दौरान जब लंकापति रावण माता सीता का हरण करके लंका ले गया,तब प्रभु श्री राम ने सुग्रीव की अनुमति लेकर लंका प्रस्थान करने का निश्चय किया । जब श्री राम अपने सैन्यदल सहित समुद्र के किनारे पहुंचे,तब उन्होंने भयंकर जल जंतुओं से भरे अगाध समुद्र को देखकर लक्ष्मणजी से कहा-'हे सुमित्रानंदन ! किस पुण्य के प्रताप से हम इस समुद्र को पार करेंगे।'तब लक्ष्मण जी बोले-'हे पुराण पुरुषोत्तम !,आप आदि पुरुष हैं, सब कुछ जानते हैं । यहाँ से आधा योजन की दूरी पर बकदालभ्य मुनि का आश्रम है ,उनके के पास जाकर आप इसका उपाय पूछिए ।' लक्ष्मण जी की इस बात से सहमत होकर श्री राम बकदालभ्य ऋषि के आश्रम गए और उन्हें प्रणाम किया । मुनि ,प्रभु राम को देखते ही पहचान गए कि ये तो विष्णु अवतार श्री राम हैं , जो किसी कारणवश मानव शरीर में अवतीर्ण हुए हैं । महर्षि ने श्री राम से उनके आने का कारण पूछा । रामचंद्र जी कहने लगे-'हे ऋषे! मैं अपनी सेना सहित राक्षसों को जीतने लंका जा रहा हूँ अतः आप कृपा करके समुद्र पार करने का कोई उपाय बताइए।' बकदालभ्य ऋषि बोले-'हे राम ! फाल्गुन कृष्ण पक्ष में जो विजया नाम की एकादशी आती है उसका व्रत करने से आपकी निश्चित विजय होगी,साथ ही आप अपनी वानर सेना के साथ समुद्र भी अवश्य पार कर लेंगे ।' मुनि के कथनानुसार श्री रामचंद्र जी सहित सभी ने इस व्रत का विधिपूर्वक पालन किया ।इसके बाद उन सभी ने रामसेतु बनाकर समुद्र को पार किया और लंकापति रावण को परास्त कर युद्ध में विजय प्राप्त की।