भगवान वराह और मां लक्ष्मी के श्रीविग्रह
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भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को वराह जयंती मनाई जाती है। माना जाता है इस दिन भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष नाम के दैत्य को मारा था। मत्स्य और कश्यप के बाद भगवान विष्णु का तीसरा अवतार है वराह। वराह यानी शुकर। इस साल वराह जयंती 17 सितंबर, रविवार के दिन मनाई जाएगी। इस मौके पर सुख-समृद्धि की कामना से भगवान विष्णु की विशेष पूजा के साथ व्रत और उपवास किए जाते हैं। साथ ही विष्णु मंदिरों में भजन-कीर्तन भी किए जाते हैं।
पूजाविधि
इस दिन साधक को प्रात:काल स्नान करने के बाद सबसे पहले वराह भगवान की मूर्ति या प्रतिमा का गंगाजल से स्नान कराएं। पीले चन्दन से तिलक करके अक्षत, पुष्प, फल, मिठाई आदि अर्पित करते हुए आरती करें। पूजा करने के बाद उनके अवतार की कथा कहें। इसके बाद भगवान वराह के मंत्र ”नमो भगवते वाराहरूपाय भूभुर्व: स्व: स्यात्पते भूपतित्वं देह्येतद्दापय स्वाहा”का जप करें।
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महत्व
मान्यता है कि भगवान वराह की पूजा के इस उपाय को करने पर साधक को भूमि-भवन आदि का सुख प्राप्त होता है। साधक में आत्मविश्वास की बढ़ोतरी होती है एवं मन के विकार दूर होते हैं। वराह जयंती के दिन श्रीमद्भगवद् गीता का पाठ करने से भी अनंत पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
वराह अवतार की कथा
पदमपुराण की कथा के अनुसार सतयुग में दैत्य हिरण्याक्ष के आतंक से समस्त देवता,धरतीवासी हाहाकार कर उठे। उसने कठोर तपस्या से ब्रह्माजी को प्रसन्न कर असीम शक्तियां भी अर्जित कर लीं थीं। हिरण्याक्ष शक्तियों के दम पर चारों ओर आतंक फैलाने लगा,उसका शरीर कितना भी बड़ा हो सकता था। दैत्य ने स्वर्गाधिपति देवराज इंद्र के लोक को भी जीत लिया और जल देवता वरुण देव को भी युद्ध के लिए ललकारा। उस महाबली दैत्य ने पृथ्वी को अपनी हज़ारों भुजाओं से पर्वत,समुद्र,द्वीप और सम्पूर्ण प्राणियों सहित उखाड़ लिया व सिर पर रखकर रसातल में ले जाकर छुपा दिया। जब पृथ्वी जलम्न हो गई तो उसे वहां से निकालने और हिरण्याक्ष दैत्य के पापों से सभी को मुक्ति दिलाने के लिए ब्रह्मा जी के नाक से भगवान विष्णु का वराह अवतार हुआ। मान्यता है कि ब्रह्मा जी की नाक से एक अंगूठे के आकार वाले वराह अवतार ने पलक झपकते ही पर्वताकार रूप धारण कर लिया, जिसे देखकर सभी देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों ने उनकी स्तुति की। इसके बाद भगवान वराह ने अपने थूंंथने की सहायता से पृथ्वी को जल से बाहर निकालने लगे, तब हिरण्याक्ष दैत्य ने भगवान वराह काे युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में काफी देर तक भीषण युद्ध हुआ। युद्ध के उपरांत विष्णुजी ने सुदर्शन चक्र से उस अधम दैत्य का वध कर दिया। इसके बाद भगवान वराह ने पहले की ही भांति पृथ्वी को रसातल से बाहर लाकर पुनः शेषनाग के ऊपर स्थापित कर तीनों लोकों को भयमुक्त कर दिया।