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Nag Panchami 2021: जानिए घर निर्माण, पितृदोष और कुल की उन्नति के लिए नाग पूजा का महत्व

Thu, 12 Aug 2021 01:04 PM IST
विनोद शुक्ला पं जयगोविंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य, नई दिल्ली

सार

नाग पंचमी 2021: शास्त्रों के अनुसार सभी अष्टनाग अष्टलक्ष्मी के अनुचर के रूप में जाने जाते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि जहां नागदेवता का वास रहता है वहां लक्ष्मी जरूर रहतीं हैं। इनकी पूजा अर्चना से आर्थिक तंगी और वंश वृद्धि में आ रही रुकावट से छुटकारा मिलता है।
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nag panchami 2021: जिनकी कुंडली में काल सर्प दोष होता है, उन्हें इस दिन पूजा करने से इस दोष से छुटकारा मिल जाती है। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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शुक्रवार, 13 अगस्त को पूरे देशभर में नाग पंचमी का त्योहार मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार नाग पंचमी का पर्व हर वर्ष श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर आता है। इस पर नाग देवता और भगवान भोलेनाथ की पूजा की जाती है। नाग हमारे शरीर में मूलाधार चक्र के आकार में स्थित हैं उनका फन सहस्रासार चक्र है। कल्पभेद के अनुसार इनके जन्म के विषय में अनेकों कहानियां मिलती हैं। लिंगपुराण के अनुसार  सृष्टि सृजन हेतु प्रयासरत ब्रह्मा जी उग्र तपस्या करते हुए हताश होने लगे तो क्रोध वश उनके कुछ अश्रु पृथ्वी पर गिरे और तक्षण सर्प के रूप में उत्पन्न हो गए। इन सर्पों के साथ कोई अन्याय न हो, 'ऐसा विचार कर भगवान सूर्य ने इन्हें पंचमी तिथि का अधिकारी बनाया, तभी से पंचमी तिथि नागों की पूजा के लिए विदित है। इसके बाद ब्रह्मा जी ने अष्टनागों अनन्त, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, कुलिक, और शंखपाल की सृष्टि की और इन नागों को भी ग्रहों के बराबर शक्तिशाली बनाया। इनमें 'अनन्त' नामक नाग में सूर्य के, 'वासुकि' चंद्रमा के, 'तक्षक' मंगल के, 'कर्कोटक' बुध के, 'पद्म' बृहस्पति के, 'महापद्म' शुक्र के, कुलिक और शंखपाल शनि ग्रह के रूप हैं। ये सभी नाग सृष्टि संचालन में ग्रहों के समान ही भूमिका निभाते हैं। भगवान विष्णु शेषनाग से शैयारूप में सेवा लेते हैं। शिव उन्हें अपने कंठ में धारण करते हैं जबकि रूद्र, गणेश और कालभैरव इन्हें यज्ञोपवीत के रूप में धारण करते हैं। इन अष्ट नागों में शेषनाग स्वयं पृथ्वी को अपने फन पर धारण करते हैं। गृह निर्माण, पितृ दोष और कुल की उन्नति के लिए नाग पूजा का और भी अधिक महत्व है।
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नाग लक्ष्मीजी के अनुचर
शास्त्रों के अनुसार सभी अष्टनाग अष्टलक्ष्मी के अनुचर के रूप में जाने जाते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि जहां नागदेवता का वास रहता है वहां लक्ष्मी जरूर रहतीं हैं। इनकी पूजा अर्चना से आर्थिक तंगी और वंश वृद्धि में आ रही रुकावट से छुटकारा मिलता है। नाग पंचमी के दिन इस मंत्र को- नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथ्वी मनु। ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः।। पढ़ते हुए नागों की पूजा करें। भावार्थ- जो नाग, पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग, सूर्य की किरणों, सरोवरों, कूप तथा तालाब आदि में निवास करते हैं। वे सब हम पर प्रसन्न हों, हम उनको बार-बार नमस्कार करते हैं। इस प्रकार नागपंचमी के दिन सर्पों की पूजा करके प्राणी सर्प एवं विष के भय से मुक्त हो सकता है। यदि नाग उपलब्ध न हों तो इनकी मूर्ति बनाकर अथवा शिवमंदिर में प्राण प्रतिष्ठित शिवलिंग पर स्थापित नाग की पूजा भी कर सकते हैं।

सर्वत्र विजयश्री के लिए नागस्तोत्र और गायत्री
शत्रु शमन, कोर्ट-कचहरी में सफलता तथा संतान सबंधी चिंता दूर करने के लिए नागों के नौ नामों वाले इस मंत्र को प्रतिदिन तीन बार पाठ करने से तत्काल लाभ मिलता है। नाग गायत्री के जाप करने से भी अभीष्ट कार्य की सिद्धि होती है। मंत्र इस प्रकार हैं-  
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अनंतं वासुकि शेष पद्मनाभं च कम्बलम्। शड्खपाल धार्तराष्ट्र तक्षकं कालियं तथा।।
एतानि नौनामानि नागानां च महात्मनाम्। सायंकाले पठेन्नित्यं प्रातः काले विशेषतः।।
तस्मे विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयीं भवेत्।।

श्रीनाग गायत्री मंत्र-  ॐ नवकुलाय विद्यमहे विषदंताय धीमहि तन्नो सर्प: प्रचोदयात्।

ज्योतिष संहिता में नाग
वैदिक ज्योतिष में राहु को काल और केतु को सर्प माना गया है। अतः नागों की पूजा करने से मनुष्य की जन्मकुंडली में राहु-केतु जन्य सभी दोष तो शांत होते ही हैं कालसर्प दोष और विषधारी जीवों के दंश का भी भय नहीं रहता। नए घर का निर्माण करते समय इन बातों का ध्यान रखते हुए कि परिवार में वंशवृद्धि हो सुख-शांति के साथ-साथ लक्ष्मी की कृपा भी बनी रहे, इसके लिए नींव में चांदी का निर्मित नाग-नागिन का जोड़ा खा जाता है। ग्रामीण अंचलों में इस दिन गावों में लोग अपने-अपने दरवाजे पर गाय के गोबर से सर्पों की आकृति बनाते हैं और नागों की पूजा करते हैं। इसी दिन से नागों को दूध पिलाने की परम्परा भी चली आ रही है।
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