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सर्वपितृ अमावस्या 2026: सर्वपितृ अमावस्या पर कर लें यह एक उपाय, सभी दोष और पापों से मिल सकती है मुक्ति

Tue, 06 Oct 2026 08:29 PM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

Sarva Pitru Amavasya 2026: इस साल 10 अक्तूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या मनाई जाएगी। यह श्राद्ध का आखिरी दिन होता है, जिसपर पूजा-पाठ और दान करना बेहद शुभ होता है। आइए इसके महत्व को जानते हैं।
 
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Sarva Pitru Amavasya 2026 - फोटो : अमर उजाला AI
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विस्तार
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Sarva Pitru Amavasya 2026: इस साल अमावस्या तिथि 9 अक्तूबर की रात 9 बजकर 35 मिनट से शुरू होकर 10 अक्तूबर की रात 9 बजकर 19 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर 10 अक्तूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या मनाई जाएगी। हिंदू धर्में  से इसे पितृपक्ष का अंतिम दिन माना जाता है और इसके अगले दिन से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होती है। ऐसे में इस तिथि पर पूजा-पाठ, दान और तर्पण करने का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि, इन शुभ कार्यों को करने से पूर्वजों की कृपा प्राप्त होती है और घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। चूंकि सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध पक्ष का अंतिम दिन होता है, इसलिए इस दिन पितृ स्तोत्र का पाठ करना भी विशेष फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसके प्रभाव से जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-शांति व समृद्धि बढ़ती है। आइए जानते हैं सर्वपितृ अमावस्या पर किए जाने वाले इस खास पाठ के बारे में।

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पितृ स्तोत्रं पाठ 

अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम् ॥
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ॥

मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्याचन्द्रमसोस्तथा ।
तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि ॥

नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि: ॥

देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान् ।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येsहं कृताञ्जलि: ॥

प्रजापते: कश्यपाय सोमाय वरुणाय च ।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि: ॥

नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु ।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ॥

सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा ।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ॥

अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् ।
अग्नीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत: ॥

ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तय:।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण: ॥

तेभ्योsखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतमानस:।
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुज: ॥
॥ इति पितृ स्त्रोत समाप्त ॥

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पितृ कवच
कृणुष्व पाजः प्रसितिम् न पृथ्वीम् याही राजेव अमवान् इभेन।
तृष्वीम् अनु प्रसितिम् द्रूणानो अस्ता असि विध्य रक्षसः तपिष्ठैः॥

तव भ्रमासऽ आशुया पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः।
तपूंष्यग्ने जुह्वा पतंगान् सन्दितो विसृज विष्व-गुल्काः॥

प्रति स्पशो विसृज तूर्णितमो भवा पायु-र्विशोऽ अस्या अदब्धः।
यो ना दूरेऽ अघशंसो योऽ अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत्॥

उदग्ने तिष्ठ प्रत्या-तनुष्व न्यमित्रान् ऽओषतात् तिग्महेते।
यो नोऽ अरातिम् समिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यत सं न शुष्कम्॥

ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याधि अस्मत् आविः कृणुष्व दैव्यान्यग्ने।
अव स्थिरा तनुहि यातु-जूनाम् जामिम् अजामिम् प्रमृणीहि शत्रून्।
 

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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