चंचला हैं मां लक्ष्मी
पौराणिक कथा के अनुसार जब दैत्यराज बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया और दानवों के त्रास से सभी देवता अत्यंत परेशान हो गए। इसके बाद देवराज इंद्र और अन्य देवता-गण भगवान विष्णु के पास पहुंचे और इसका दानवों से विजय प्राप्त करने का निवारण पूछा, तब भगवान विष्णु ने उन्हें समुद्र मंथन करने को कहा, जिसके बाद देवता और दानवों में मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया। समुद्र मंथन के समय एक-एक करके क्रमशः चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई, जिसमें आठवें रत्न को रूप में मां लक्ष्मी यानी धन, समृद्धि, वैभव और ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी की उत्पत्ति हुई। जल से उत्पत्ति होने के कारण इनका स्वभाव चंचल माना गया है, इसलिए ये एक स्थान पर नहीं ठहरती हैं।
इसलिए की जाती है कुबेर देव की पूजा
कुबेर देव के विषय में कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं। धार्मिक ग्रंथों में मिलने वाली एक कथा के अनुसार, इन्हें रावण के गौत्र का बताया जाता है, लेकिन राक्षस वर्ण के होने के बाद भी इन्हें देव के रूप में पूजा जाता है। इनको यक्ष भी कहा जाता है, यक्ष यानी रक्षा करने वाला। ये धन के रक्षक देव के रूप में पूजे जाते हैं। धार्मिक ग्रंथो में इन्हें देवताओं के धन कोषाध्यक्ष भी कहा गया है। जहां मां लक्ष्मी चंचला कहलाती हैं और एक जगह ठहरना उनका स्वभाव नहीं है तो वहीं कुबेर देव को स्थाई संपत्ति का देवता माना गया है। यही कारण है कि दिवाली पर मां लक्ष्मी के साथ कुबेर देव का पूजन भी किया जाता है ताकि घर में स्थाई रूप से धन संपत्ति बनी रहे।