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Bhadalya Navami: मांगलिक कार्यों के लिए श्रेष्ठ तिथि है भड़ल्या नवमी, जानिए महत्व और पौराणिक कथा

Mon, 15 Jul 2024 07:45 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

भड़ल्या नवमी तिथि को अबूझ मुहूर्त माना जाता है और यह तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि जिन लोगों का विवाह का मुहूर्त नहीं निकलता, उनका विवाह इस तिथि में किया जाता सकता है।
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आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को भड़ल्या नवमी मनाई जाती है। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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Bhadalya Navami: आज 15 जुलाई को भड़ल्या नवमी मनाई जाएगी। हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को भड़ल्या नवमी मनाई जाती है। इस बार भड़ल्या नवमी 15 जुलाई, सोमवार को मनाई जाएगी। शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि कल यानी 14 जुलाई को शाम 5 बजकर 26 मिनट पर शुरू होगी, वहीं समापन आज यानि 15 जुलाई को शाम सात बजकर 19 मिनट पर होगा। इस समय में अपने इष्टदेव की पूजा कर कोई भी  शुभ कार्य कर सकते हैं। भड़ल्या नवमी को भड़रिया नौमी, भड़ल्या नवमी, भढली नवमी, भड़ली नवमी, भादरिया नवमी, भदरिया नवमी, कन्दर्प नवमी एवं बदरिया नवमी आदि नाम से भी जाना जाता है। इसी दिन आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि की नवमी तिथि भी है। भड़ली नवमी में अबूझ मुहूर्त होता है। इस तिथि को बगैर पंचांग को देखे विवाह से लेकर कोई मांगलिक कार्य किये जा सकते हैं। इस बार नवमी के दिन कई शुभ योग बन रहे हैं। इसलिए इसका महत्व बढ़ जाता है।

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भडल्या नवमी का धार्मिक महत्व 
भड़ल्या नवमी तिथि को अबूझ मुहूर्त माना जाता है और यह तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि जिन लोगों का विवाह का मुहूर्त नहीं निकलता, उनका विवाह इस तिथि में किया जाता सकता है। इस तिथि को किया गया विवाह हर तरह से सुख-सौभाग्य प्रदान करने वाला होता है और जीवन में किसी तरह की परेशानी नहीं होती। देवशयनी एकादशी को भगवान विष्णु क्षीर सागर में शयन के लिए चले जाते हैं, उससे पहले केवल इस तिथि को ही शुभ व मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं। देवशयनी एकादशी से चातुर्मास प्रारंभ हो जाता है, उसके बाद चार महीनों के लिए सभी शुभ कार्य रुक जाते हैं। नवमी तिथि को भगवान विष्णु की पूजा अर्चना और हवन करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है और जीवन में कभी भी धन धान्य की कमी नहीं होती है। इस दिन खरीदारी और नए कार्य की शुरुआत करने से मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है और घर में सुख शांति और समृद्धि का आगमन होता है।

पौराणिक कथा 
कथा के अनुसार भगवान शिव और मां पार्वती के विवाह कराने हेतु देवी-देवता बहुत प्रयास करते हैं। देवी पार्वती भी भगवान शिव को पाने हेतु कठोर व्रत का पालन करती हैं किंतु भगवान शिव अपनी योग साधना से जब बाहर नहीं आते हैं, तब उस समय सभी देवता कामदेव के पास जाकर उन्हें भगवान शिव के भीतर काम भवना जागृत करने को कहते हैं, किंतु कामदेव जब भगवान शिव को जगाने हेतु प्रयास करते हैं तो उस समय भगवान अपने क्रोध के कारण तीसरे नेत्र से कामदेव को भस्म कर देते हैं। ऐसे में देवी रति अपने पति की मृत्यु से व्यथित होकर विलाप करने लगती हैं। भगवान शिव उनकी दशा देखकर कामदेव की पुन: प्राप्ति का आशीर्वाद देते हैं। इसी आशीर्वाद के अनुरूप आषाढ़ नवमी के दिन कामदेव के रूप में देव कन्दर्प का जन्म होता है। कन्दर्प देव को भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म लेते हैं और कंदर्प नाम से विख्यात होते हैं। इसलिए इस दिन को विवाह आदि सभी शुभ कार्यों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।  

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