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Aja Ekadashi 2021: अजा एकादशी पर भगवान विष्णु के साथ करें मां लक्ष्मी की पूजा, सुख-समृद्धि की होगी बरसात

Thu, 02 Sep 2021 11:13 AM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन ,वास्तुविद

सार

  • मान्यता है कि एकादशी के दिन भगवान विष्णु के साथ लक्ष्मी की पूजा करना अति फलदायी और शुभ होती है, इसलिए इस दिन दोनों की पूजा एक साथ करनी चाहिए।
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Aja Ekadashi 2021: एकादशी के दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। - फोटो : Social media
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विस्तार
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धार्मिक दृष्टि से अजा एकादशी का व्रत बेहद ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इस साल यह व्रत भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 3 सितंबर, शुक्रवार को रखा जाएगा। अजा एकादशी की महिमा के बारे में धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्री कृष्ण बताते हैं कि अजा एकादशी सब पापों का नाश करने वाली है। जो भगवान ऋषिकेश का पूजन करके भक्ति-भाव से इसका व्रत करता है, वह इस लोक में सुख भोगकर अंत में विष्णुलोक में जाता है।इस व्रत का फल अश्वमेघ यज्ञ, कठिन तपस्या, तीर्थों में दान-स्नान आदि से मिलने वाले फलों से भी अधिक होता है। इस एकादशी का व्रत चित्त को शांत और निर्मल बनाता है।

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लक्ष्मी के साथ हो विष्णुजी की पूजा
मान्यता है कि एकादशी के दिन भगवान विष्णु के साथ लक्ष्मी की पूजा करना अति फलदायी और शुभ होती है, इसलिए इस दिन दोनों की पूजा एक साथ करनी चाहिए। इस दिन प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत होकर भगवान विष्णु का माँ लक्ष्मी के साथ गोपी चन्दन, चावल, पीले पुष्प, ऋतु फल, तिल एवं मंजरी सहित तुलसी दल से पूजन करें। एकादशी के दिन गीता पाठ, विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ व 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करने से प्राणी पापमुक्त-कर्जमुक्त होकर विष्णुजी की कृपा पाता है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ पीपल के वृक्ष की पूजा का भी विधान है। दिन भर निराहार रहते हुए शाम को फलाहार कर सकते हैं। एकादशी के दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। एकादशी के दिन चावल नहीं खाना चाहिए। यदि आप किसी कारण से व्रत नहीं कर सकते है तो इस दिन मन में विष्णु भगवान का ध्यान करते हुए सात्विक रहें, झूठ न बोले, किसी का मन नहीं दुखाएं एवं पर निंदा से बचें।

व्रत का कथानक
प्राचीनकाल में हरिशचंद्र नामक एक चक्रवर्ती राजा राज्य करता था। प्रभु इच्छा से उसने अपना राज्य स्वप्न में एक ऋषि को दान कर दिया और परिस्थितिवश उन्हें अपनी स्त्री और पुत्र को भी बेच देना पड़ा। स्वयं वह एक चाण्डाल के दास बन गए। वो राजा चांडाल का दास बनकर सत्य को धारण करता हुआ मृतकों का वस्त्र ग्रहण करता रहा। मगर कोई भी स्थिति उसे सत्य से विचलित नहीं कर पाई। इस प्रकार राजा को कई वर्ष बीत गए। एक दिन राजा इसी चिंता में बैठा हुआ था, तभी गौतम ऋषि आ गए। राजा ने उन्हें देखकर प्रणाम किया और अपनी सारी दुखभरी कथा सुनाई।राजा हरिशचंद्र की बात सुनकर गौतम ऋषि कहने लगे कि राजन तुम्हारे भाग्य से आज से सात दिन बाद भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अजा नाम की एकादशी आएगी, उस व्रत को तुम पूर्ण निष्ठा और विधिपूर्वक रखना।व्रत के पुण्य प्रभाव से तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे। इस प्रकार राजा से कहकर गौतम ऋषि उसी समय अंतर्ध्यान हो गए। राजा ने उनके कहे अनुसार एकादशी आने पर विधिपूर्वक व्रत व जागरण किया।उस व्रत के प्रभाव से राजा के समस्त पाप नष्ट हो गए। व्रत के प्रभाव से राजा को पुन: उसका राज्य मिल गया और अंत में वह अपने परिवार सहित विष्णु लोक को गया।

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