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लाश वाले टैंक का 2 साल पानी पिलाने के लिए जिम्मेदार कौन?

Wed, 24 Aug 2016 10:14 AM IST
दयाशंकर शुक्ल सागर
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किसी भी सभ्य समाज में इससे वीभत्स खौफनाक और क्या हो सकता है? शिमला शहर की सीमा पर सबसे पॉश, हरा भरा और शांत वीआईपी इलाका- क्लस्टन। कभी हिमाचल हाईकोर्ट की नींव यहां रखी गई थी। जजों की कालोनी के बीचों बीच नगर निगम का पानी का टैंक बाहर से किसी बौद्ध स्तूप जैसा दिखता है।
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युग अपहरण के आरोपियों ने कबूल किया कि उन्होंने उस चार साल के मासूम बच्चे की नंगी लाश इस टैंक में 22 जून 2014 को फेंकी थी। अब ये खबरें आ रही हैं कि दरिंदों ने उसे भारी पत्थर से बांध कर इस टैंक में जिंदा ही फेंक दिया गया था। वह मासूम पानी में छटपटा कर मर गया। आरोपियों के कबूलनामे पर सीआईडी की टीम ने सोमवार को उस टैंक को खाली करवाकर उसमें से लाश की बची हुई कुछ हड्डियां बरामद कीं।
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समझा, लंगूर का कंकाल है

अगले ही साल शहर में पीलिया फैला तो शहर के सारे टैंकों की सफाई हुई। इस वीआईपी इलाके के क्लस्टन टैंक की भी मार्च 2015 में कथित तौर पर सफाई हुई। जैसा कि अब चर्चा है- सफाई के दौरान इस टैंक से एक अस्थि पिंजर निकला था। नगर निगम कर्मचारियों ने समझा, यह किसी लंगूर का कंकाल है।

उसे टैंक से बाहर फेंक दिया गया। किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि एक बंद पानी के टैंक में बंदर का कंकाल कैसे आ सकता है? जबकि ऊपर से पत्थर का ढक्कन बंद है। तब इस घटना का जिक्र किसी रिकॉर्ड में नहीं आया। सीआईडी को कुछ हड्डियां टैंक के बाहर भी मिलीं जो संभवत: टैंक की सफाई के बाद कचरा समझकर फेंक दी गई थीं।

नहीं की गई टैंक की सफाई

इन तथ्यों से साफ है कि जून 2014 से मार्च 2015 तक इस टैंक की सफाई नहीं की गई। यानी इस इलाके के लोगों को वही पानी पीना पड़ा, जिसमें एक मासूम का शव दस महीने से सड़ रहा था। फोरेंसिक विशेषज्ञों के मुताबिक चार साल के बच्चे का शव जिसे कई दिन से खाने को भी न मिला हो, रोज बदलते पानी में उसकी देह डी-कंपोज होने के लिए दस महीने काफी हैं।

यही वजह है कि मार्च 2015 को टैंक की सफाई में सिर्फ अस्थि पिंजर मिला, जिसे कचरा समझ कर फेंक दिया गया। नगर निगम के नियमों के मुताबिक पेयजल के हर टैंक की सफाई छह महीने में होनी चाहिए थी। मार्च 2015 से पहले इस टैंक की सफाई कब हुई, इसका रिकॉर्ड नगर निगम के पास नहीं है।

सफाई हुई तो फिर कैसे मिले शव के अवशेष

निगम के दावे के मुताबिक मार्च के बाद सितंबर 2015 में फिर इस टैंक की सफाई हुई। जनवरी 2016 में भी इस टैंक को साफ किया गया। इसके बावजूद इस टैंक में सीआईडी की टीम को शव के अवशेष मिल गए। यानी इससे निगम के सफाई की गुणवत्ता के दावे पर सवाल उठ जाते हैं।

हैरानी की बात यह है कि नगर निगम इस टैंक के पानी के नमूने जांच के लिए आईजीएमसी भेजता है और आईजीएमसी की लैब इस पानी को एक्सीलेंट बताती है। जब शहर के सबसे वीआईपी इलाके के टैंक की सफाई का यह हाल है तो आम नागरिकों की नगर निगम को कितनी परवाह होगी इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

सबसे चौंकाने वाली बात कि नगर निगम के पास इन टैंकों की सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं है। शिमला में ही कोई 42 वाटर टैंक हैं। लेकिन किसी टैंक के ढक्कन पर ताले का प्रबंध नहीं। न कोई बाउंड्री है और न फेंसिंग। कोई भी शख्स रात के अंधेरे में बड़ी आसानी से टैंक की सीढ़ियां चढ़कर पानी की सार्वजनिक सप्लाई में कुछ भी मिला सकता है। यह कितना खतरनाक तथ्य है। आप समझ सकते हैं।
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दो साल तक पिलाते रहे लाश वाले टैंक का पानी

सबसे खतरनाक बात यह है कि दो साल तक लाश वाले टैंक का पानी पिलाने के लिए जिम्मेदार कौन है? शिमला पुलिस जो मुख्य अभियुक्त को अपने साथ लेकर लापता युग को दर दर खोजती रही? नगर निगम, जिसने शहर के टैंकों की सफाई तक नहीं शुरू की जब तक हाईकोर्ट ने आदेश नहीं जारी किए? आईजीएमसी की प्रयोगशाला, जो पानी के हर नमूने को एक्सीलेंट का तमगा देती रही जैसे वह नगर निगम की रिपोर्ट नहीं बल्कि जमा चार के बच्चे की गणित की कॉपी हो?

या क्लस्टन जज कालोनी में तैनात सुरक्षा फोर्स जिसकी आंखों के सामने एक बच्चे की लाश टैंक में फेंक दी गई? ये सिस्टम जिसकी अपनी ही नौकरशाही पर कोई काबू नहीं रह गया है? या इन सब की जिम्मेदार आम पब्लिक है जो आवाज नहीं उठाती और अखबार पढ़कर अगले दिन की खबरों का इंतजार करती है?
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