मोटी तनख्वाह पाने वाले सरकारी अफसरों द्वारा फर्जीवाड़ा कर गरीबों की सबसे निचली श्रेणी बीपीएल और अंत्योदय में शामिल होने का मामला हिमाचल प्रदेश में इस साल खासा चर्चा का विषय बना रहा। इस फर्जीवाड़े के सामने आने के बाद सरकार में हड़कंप मच गया। अधिकारी सालों से डिपुओं में मिलने वाले गरीब लोगों के सस्ते राशन को डकारते रहे। खाद्य नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ।
इनमें 145 सरकारी अफसर ऐसे पाए गए, जो स्कूल प्रवक्ता, मेडिकल अफसर, असिस्टेंट प्रोफेसर, एक्साइज टेक्नीशियन और अधीक्षक पद पर तैनात होने के बावजूद गरीब लोगों को मिलने वाला सस्ता राशन डकार गए। खाद्य आपूर्ति विभाग ने इसे गंभीरता से लेते हुए ग्रामीण विकास विभाग को पत्र लिखकर पूछा है कि किस आधार पर इन्हें अंत्योदय और बीपीएल की श्रेणी में लाया गया। फर्जीवाड़े के सामने आने के बाद सरकार हरकत में आई।
बीपीएल और अंत्योदय सूची में शामिल होने वाले सरकारी अफसरों के राशन कार्ड रद्द किए गए। इसके अलावा इन अफसरों के परिवार में किसी ने बीपीएल और अंत्योदय के कोटे से सरकारी नौकरी तो नहीं हासिल की, विभाग ने इसकी जांच के भी आदेश जारी किए। खाद्य आपूर्ति विभाग की ओर से जारी की गई गरीब अफसरों की सूची में प्रवक्ता, मेडिकल ऑफिसर ही नहीं, बल्कि डिप्टी डायरेक्टर, प्रिंसिपल और इंजीनियर भी शामिल थे।
जिला कांगड़ा में सर्वाधिक 45 और शिमला में गरीबों का हक छीनने वाले अफसरों की संख्या 22 है। अमर उजाला में खबर प्रकाशित होने के बाद प्रदेश सरकार ने जांच शुरू की। सरकार ने फर्जी बीपीएल अफसरों पर शिकंजा कसते हुए मामले ही जांचकर दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए। इन अफसरों से रिकवरी भी की गई। जांच में खुलासा हुआ है कि इन फर्जी बीपीएल अफसरों ने गरीबी रेखा से नीचे होने का शपथपत्र भी दिया है। खाद्य आपूर्ति मंत्री राजेंद्र गर्ग ने कहा कि फर्जी गरीब अफसरों से करीब 24 लाख रुपये रिकवर किए गए हैं। विभाग को इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए गए हैं।