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पंडित सुखराम का दौर हो या सीएम जयराम का, हावी रही वीरभद्र की सियासत

Fri, 09 Jul 2021 10:09 AM IST
अरविन्द ठाकुर अखिलेश महाजन, अमर उजाला नेटवर्क, मंडी

सार

सुखराम हिमाचल के मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन वीरभद्र की सियासी चालों से वह हर बार मात खा गए।
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पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
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मंडी संसदीय क्षेत्र पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की कर्मभूमि रहा है। पंडित सुखराम का दौर हो या वर्तमान मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का, वीरभद्र की सियासत हमेशा हावी रही है। सियासत के पुरोधा  वीरभद्र सिंह ने मंडी से कई बार बड़े उलटफेर करते हुए प्रदेश की राजनीति को दिशा दी। राजनीति में चाणक्य माने जाने वाले पूर्व संचार मंत्री सुखराम शर्मा से उनका छत्तीस का आंकड़ा रहा। दोनों दिग्गजों के शह और मात के खेल में सुखराम का मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का सपना आजीवन अधूरा रहा। वहीं, पार्टी से हटकर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के साथ उनके मधुर रिश्ते रहे। 

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1993 में मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए सुखराम, 1998 में वीरभद्र की सरकार के हाथ से गई सत्ता
सुखराम हिमाचल के मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन वीरभद्र की सियासी चालों से वह हर बार मात खा गए। पंडित सुखराम और वीरभद्र के बीच तनातनी का एक किस्सा साल 1993 का है, जब 8वीं हिमाचल विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस को जनता ने 52 सीटों पर विजय दिलवाई। वर्ष 1993 में पंडित सुखराम कांग्रेस में रहते हुए हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए। उनकी जगह वीरभद्र सिंह मुख्यमंत्री बने थे। जबकि हाईकमान भी सुखराम को मुख्यमंत्री बनाना चाह रहा था, लेकिन राजनीति इतनी हावी हो गई कि वह मुख्यमंत्री पद से चूक गए।

इसी तरह 1998 में सुखराम के पाले में गेंद रही। साल 1998 में 9वीं विधानसभा के चुनाव हुए तो सुखराम ने अपनी एक अलग पार्टी हिमाचल विकास कांग्रेस (हिविकां) का गठन किया। भाजपा और कांग्रेस को बराबर-बराबर 31-31 सीटें मिली। 1998 के चुनाव में सुखराम की हिविकां को 5 सीटें मिली। इस बार पाला सुखराम के खाते में था और उन्होंने धूमल की भाजपा को अपना समर्थन दे दिया और गठबंधन की सरकार हिमाचल में बनी।

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जब वीरभद्र ने भाषण के लिए पहले जयराम को खड़ा किया
किस्सा 2017 का है। विधानसभा चुनाव से पहले सराज के शैटाधार में नया हेलीपैड बनने और देव शैटिनाग के मंदिर की प्रतिष्ठा में सराज कांग्रेस ने सीएम वीरभद्र सिंह को बतौर मुख्यातिथि आमंत्रित किया। कांग्रेस की जनसभा में बतौर विधायक खड़े जयराम ने वीरभद्र का अपने हलके में स्वागत किया और वीरभद्र जयराम को साथ पकड़कर कांग्रेस की जनसभा में ले गए। कांग्रेस नेताओं ने भाषण की लिस्ट से जयराम का नाम काट दिया था। इस पर वीरभद्र सिंह तल्ख हुए और अपने से पहले जयराम को भाषण देने के लिए कांग्रेस की जनसभा में खड़ा कर दिया था।

आया राम, गया राम बोलने के बाद अनिल ने दिया था इस्तीफा
अक्तूबर 2017 के विधानसभा चुनाव में वीरभद्र और सुखराम एक बार फिर मंच पर आमने-सामने थे। सार्वजनिक मंच पर दोनों एक दूसरे के खिलाफ खुलकर सामने आए। तब वीरभद्र मुख्यमंत्री थे। उन्होंने सुखराम के परिवार का इतिहास गिनाते हुए उन्हें आया राम गया राम की संज्ञा दे दी। पहले से ही नाराज चल रहे सुखराम के बेटे अनिल शर्मा ने कांग्रेस के मंत्री पद से इस्तीफा देते हुए भाजपा ज्वाइन की और 2017 के चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस के मजबूत मंडी सदर के किले पर भगवा फहराया।

मंडी से जुड़ा सियासी सफर, तीन बार रहे सांसद
1967 और 1972 में वीरभद्र मंडी से चुनाव लड़कर लोकसभा पहुंचे। हालांकि, आपातकाल के बाद 1977 के लोकसभा चुनाव में वीरभद्र को हार का मुंह देखना पड़ा। उन्होंने अपनी निष्ठा नहीं बदली और इंदिरा गांधी के वफादार बने रहे। 1980 में फिर चुनाव हुए और वीरभद्र सिंह फिर जीत कर लोकसभा पहुंच गए। 1982 में इंदिरा सरकार में उन्हें उद्योग राज्य मंत्री भी बना दिया गया। 2007 में प्रदेश की सत्ता से बाहर होने के बाद वीरभद्र सिंह ने दोबारा मंडी संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा। भारी मतों से जीतकर पांचवीं बार सांसद चुने गए। मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में इस्पात मंत्री बने। उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह भी दो बार मंडी संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।
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