वर्तमान में सप्त सिंधु के सिद्धांत को स्थापित करना है तो गुरुवाणी ग्रंथ इसके लिए सबसे बड़ा माध्यम बन सकता है। सिख पंथ की दस गुरु परंपरा में सप्त सिंधु के सिद्धांत को बेहतर तरीके से वर्तमान पीढ़ी के सामने प्रस्तुत किया जा सकता है। यह बात केंद्रीय विश्वविद्यालय के देहरा परिसर में कुलपति डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने कही।
सीयू के कुलपति सप्त सिंधू/पंजाब का इतिहास: एक पुनरावलोकन विषय पर आयोजित संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे। मुख्य वक्ता ने कहा कि दस गुरु परंपरा शुरू होने से पहले सप्त सिंधु क्षेत्र के लगभग 80 प्रतिशत लोग धर्म परिवर्तन कर चुके थे, लेकिन गुरु नानक देव के आने से धर्म परिवर्तन की गति को बड़ी लगाम लगी।
वर्तमान में सप्त सिंधु के सिद्धांत को स्थापित करने की दिशा में काम करने की जरूरत है। संगोष्ठी में संकल्प संस्था के संस्थापक संतोष तनेजा, दिल्ली विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त पंजाबी विभाग के अध्यक्ष डॉ. जगबीर सिंह, मुकंदपुर कॉलेज पंजाब के प्राचार्य धर्मवीर सिंह, पंजाब विवि चंडीगढ़ की संध्याकालीन अध्ययन के चेयरमैन गुरपाल सिंह, फगवाड़ा कॉलेज के सहायक आचार्य अवतार सिंह, बटाला के डॉ. नरेश कुमार ने भी उपरोक्त विषय पर अपने विचार रखे।
इस मौके पर हिमाचल हाईकोर्ट के अधिवक्ता कपिल सूद, जनजातीय पीठ के चेयर प्रो. डॉ. सतीश गंज्जू, डॉ. बलवान गौतम, डॉ. राकेश कुमार, जनजातीय और अंबेडकर पीठ के शोधार्थी और इतिहास विभाग के विद्यार्थी मौजूद रहे।
तक्षशिला के पाठ्यक्रम में गीता का जिक्र
सीयू के कुलाधिपति प्रो. हरमोहेंद्र सिंह बेदी ने कहा कि सप्त सिंधु एशिया का केंद्र था। तक्षशिला विवि के अवशेषों में जो पाठ्यक्रम मिले हैं, उस पाठ्यक्रम के अनुसार तक्षशिला में श्रीमद्भागवत गीता, रामायण व ऋग्वेद ग्रंथों की पढ़ाई होने का जिक्र मिला है। अब तो संयुक्त राष्ट्र संगठन(यूएनओ) ने भी ऋग्वेद को प्राचीनतम ग्रंथ माना है।